Tuesday, December 10, 2024
चिंताजनक स्थिति में मानवाधिकार
Monday, January 22, 2024
भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के प्रमुख नायक नेता जी सुभाष चंद्र बोस
Friday, September 15, 2023
अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस
Saturday, August 13, 2022
कट्टरता (असहिष्णुता) का प्रतिकार लोकतंत्र को बनाये रखने की अनिवार्य शर्त
Sunday, August 1, 2021
सही अर्थों में आधुनिक भारत के निर्माता थे लोकमान्य तिलक
आज "स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है...." के महान नारे का उदघोष करने वाले, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि है.
तिलक को आधुनिक भारत का निर्माता कहा जा सकता है. उन्होंने स्वाधीनता संघर्ष के साथ साथ लोगों में जागरूकता लाने और उनके विकास के लिए शिक्षा पर बहुत बल दिया था.
स्वाधीनता संघर्ष में कांग्रेस में 'लाल-बाल-पाल ' का एक यादगार युग रहा है . तिलक इस त्रिवेणी के एक प्रमुख सदस्य थे. 'केसरी एवं 'मराठा' समाचार पत्रों के माध्यम से उन्होंने जन जागरूकता का महान कार्य किया.
उनका सार्वजनिक जीवन 1880 में एक शिक्षक के रूप में आरम्भ हुआ.
तत्कालीन भारत के उस समय के वाइसरॉय लॉर्ड कर्ज़न ने जब सन 1905 में बंगाल का विभाजन का निर्णय लिया, तो बंगाल में इस विभाजन को रद्द कराने के लिये आंदोलन शुरू हो गया. तिलक 'बंग भंग' का मुखर विरोध किया और ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार की अपील की और यह आंदोलनएक देशव्यापी आंदोलन बन गया.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरम पंथी गुट से तिलक सहमत नहीं थे. तिलक के विचार उग्र थे. ननरपंथी छोटे सुधारों के लिए सरकार के पास वफ़ादार प्रतिनिधिमंडल भेजने में विश्वास रखते थे जबकि तिलक का लक्ष्य स्वराज्य था, छोटे- मोटे सुधार नहीं और उन्होंने कांग्रेस को अपने उग्र विचारों को स्वीकार करने के लिए राज़ी करने का प्रयास किया. इस मामले पर 1907 में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में नरम दल के साथ उनका घोर वादविवाद हुआ. इस अधिवेशन में कांग्रेस 'गरम दल' और 'नरम दल' में विभाजित हो गई. गरम दल में तिलक के साथ लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल शामिल थे. ये तीनों को ' लाल-बाल-पाल ' के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध हैं.
1908 में तिलक ने क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस के बम हमले का समर्थन किया जिसके कारण सरकार ने उन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर मुकदमा चलाया. तिलक का मुकदमा मुहम्मद अली जिन्ना ने लड़ा. परंतु तिलक को 6 वर्ष कैद की सजा सुना दी गई और मांडले (तत्कालीन बर्मा ,वर्तमान म्यांमार) भेज दिया गया. जेल से छूटकर वे फिर कांग्रेस में शामिल हो गए और 1916-18 में ऐनी बेसेंट और मुहम्मद अली जिन्ना के साथ उन्होंने 'अखिल भारतीय होम रुल लीग' की स्थापना की. तिलक का स्पष्ट मत था -"स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा."
1916 में मुहम्मद अली जिन्ना के साथ उन्होंने 'लखनऊ समझौता' किया, जिसमें स्वातंत्र्य संघर्ष में हिन्दू- मुस्लिम एकता का प्राविधान था.
तिलक 'बाल विवाह' के विरुद्ध थे उन्होंने अपने कई भाषणों में इस सामाजिक कुप्रथा का विरोध किया. वह एक अच्छे लेखक भी थे. उनका जेल में लिखा 'गीता रहस्य'' गीता पर एक अत्यंत उत्कृष्ट भाष्य है . मराठी में 'केसरी' और अंग्रेज़ी में 'द मराठा' समाचार पत्रों के माध्यम से अपने लेखों से लोगों की राजनीतिक चेतना की अलख जगाने का कार्य किया .
तिलक ने बंबई में अकाल और पुणे में प्लेग की महामारी के समय इसके विरुद्ध संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई जिसकी वजह से लोगों के हृदय में उन्होंने एक अविस्मरणीय स्थान बना लिया था.
1 अगस्त, 1920 को मुंबई में लोकमान्य तिलक का निधन हो गया. उन्हें श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुये गाँधी जी ने उन्हें 'आधुनिक भारत का निर्माता ' बताया. पं जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें ' भारतीय क्रांति के जनक' कहा. तिलक सही अर्थो में आधुनिक भारत की नींव रखने वाले पुरोधा थे.
पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि.
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Saturday, July 24, 2021
हमारी संस्कृति का एक गौरवपूर्ण अध्याय है 'गुरु परंपरा'
Saturday, June 19, 2021
अलविदा मिल्खा सिंह जी
भारत के महान धावक एवं एथलेटिक्स में देश का गौरव बढ़ाने वाले पद्मश्री मिल्खा सिंह जी का गत दिवस (शुक्रवार )को निधन 91 वर्ष कीआयु में निधन हो गया. वे कोरोना संक्रमण से ग्रसित थे.
मिल्खा सिंह जी का जन्म 20 नवंबर 1929 को अविभाजित भारत के गोविंदपुरा में एक किसान परिवार में हुआ था. वे अपने माता पिता की 15 संतानों में से एक थे. विभाजन की त्रासदी के दौरान उनके माता-पिता एवं आठ भाई-बहन मारे गए. इस भयावह हादसे के बाद मिल्खा सिंह पाकिस्तान से ट्रेन की महिला बोगी में छिपकर किसी तरह दिल्ली पहुंचे.
मिल्खा सिंह जी ने देश के विभाजन के बाद दिल्ली के शरणार्थी शिविरों में अपने दुखदायी दिनों को याद करते हुए एक बार कहा था, '"जब पेट खाली हो तो देश के बारे में कोई कैसे सोच सकता है? जब मुझे रोटी मिली तो मैंने देश के बारे में सोचना शुरू किया." इन विषम परिस्थितियों से उत्पन्न आक्रोश ने उन्हें आखिरकार असाधारण लक्ष्य तक पहुॅंचा दिया. उन्होंने कहा था, 'जब आपके माता-पिता को आपकी आंखों के सामने मार दिया गया हो तो क्या आप कभी भूल पाएंगे... कभी नहीं.'
मिल्खा सिंह 'फ्लाइंग सिख' के नाम से जाने जाते थे. 2016 में 'इंडिया टुडे' को दिए इंटरव्यू में उन्होंने इसके पीछे की घटना बतायी ," 1960 में उनको पाकिस्तान की "इंटरनेशनल एथलीट प्रतियोगिता' में भाग लेने का आमंत्रण मिला था. पर देश के विभाजन की त्रासदी के अपने दुःखद अनुभव को भुला नहीं पा रहे थे, और पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे. भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जब यह बात पता चली तो उन्होंने मिल्खा सिंह को समझाया. तब वे पाकिस्तान जाने के लिए राजी हुए.
पाकिस्तान में उस समय अब्दुल खालिक की तूती बोलती थी जो वहाँ के वह सबसे तेज धावक थे. प्रतियोगिता के दौरान लगभग 60000 पाकिस्तानी फैन्स अब्दुल खालिक का जोश बढ़ा रहे थे, लेकिन मिल्खा सिंह की रफ्तार के सामने खालिक टिक नहीं पाए थे.
इस जीत के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अयूब खान ने उन्हें 'फ्लाइंग सिख' का नाम से संबोधित किया और वे इस नाम से जाने जाने लग."
मिल्खा सिंह चार बार एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता रहे. उन्होंने 1958 के 'कामनवैल्थ गेम्स' में भी स्वर्ण पदक प्राप्त किया था. 1959 में उन्हें खेलों में योगदान के लिये देश के महान सम्मान 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया. उन्होंने 1956, 1960 एवं1964 के ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था. यद्यपि उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 1960 के 'रोम ओलंपिक' में था, जिसमें वे 400 मीटर फाइनल में चौथे स्थान पर रहे थे.
'राष्ट्रमंडलीय और एशियाई खेलों' के स्वर्ण पदक विजेता मिल्खा सिंह के नाम 400 मीटर का राष्ट्रीय रिकॉर्ड 38 साल तक रहा.
मिल्खा सिंह जी के महाप्रयाण के साथ एथलीट के एक युग का अवसान हो गया. वे ऐसे व्यक्तित्व थे जिनका देशवासियों जिनका के ह्रदय में विशेष सम्मान था. देश के ऐसे महान रत्न को विनम्र श्रद्धांजलि.
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Friday, June 4, 2021
प्रकृति से अनुकूलता के दृढ़ संकल्प की आवश्यकता
Friday, May 21, 2021
लेकिन लगते सबसे अच्छे....वे तारे ...जो टूट गये है...
Saturday, March 20, 2021
आइये! गौरैया की प्रजाति के संरक्षण का संकल्प लें।
Thursday, February 4, 2021
'चौरा- चोरी' कांड के शहीदों को शत् शत् नमन
'चौरा - चौरी कांड' का शताब्दी वर्ष
Wednesday, January 20, 2021
सीमांत गाँधी खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान- एक अदभुत् व्यक्तित्व -
Wednesday, January 13, 2021
आवाहन..... चलो! मिटायें सारी भ्रांति
हर्ष और उल्लास का पर्व 'लोहड़ी'
Friday, December 18, 2020
शहादत दिवस पर अमर बलिदानियों को शत् शत् नमन
'काकोरी -काण्ड' के शहीदों को कोटि कोटि नमन
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भारतीय स्वाधीनता संघर्ष में क्रान्तिकारियों का योगदान महत्वपूर्ण रहा है. ' काकोरी कांड' क्रांतिकारियों द्वारा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के उद्देश्य से हथियार खरीदने के लिये ब्रिटिश सरकार का ही खजाना लूटने का एक प्रयास था. यह प्रयास 9 अगस्त 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में हिंदुस्तान रिपब्लिकन ऐसोशियेशन के क्रांतिकारियों ने लखनऊ के समीप काकोरी नामक स्थान पर सरकारी खजाना ले जा रही ट्रेन को लूट कर संपादित किया. इस ट्रेन डकैती में जर्मनी के बने चार माउज़र पिस्तौल काम में लाये गये थे।इन पिस्तौलों की विशेषता यह थी कि इनमें बट के पीछे लकड़ी का बना एक और कुन्दा लगाकर रायफल की तरह उपयोग किया जा सकता था।
क्रान्तिकारियों द्वारा चलाए जा रहे 'स्वतन्त्रता आन्दोलन ' को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था हेतु शाहजहाँपुर में हुई बैठक के दौरान हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोशियेशन की बैठक में अध्यक्ष क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के सुझाव पर अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनायी गयी थी। इस योजना के अनुसार क्रांतिकारी दल के ही एक प्रमुख सदस्य राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने 9 अगस्त 1925 को लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी "आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन" को चेन खींच कर रोका और क्रान्तिकारी पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाक उल्ला खाँ, पण्डित चन्द्रशेखर आज़ाद व 60 अन्य क्रांतिकारियों की सहायता से धावा बोलते हुए सरकारी खजाना लूट लिया।
अंग्रेजी सरकार ने ' हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन ' के कुल 400क्रान्तिकारियों पर सरकार के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व यात्रियों की हत्या करने का मुकदमा चलाया जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह को मृत्यु-दण्ड (फाँसी की सजा) सुनायी गयी। 17 दिसंबर1927 को राजेंद्र नाथ लाहिड़ी एवं 19 दिसंबर 1927 को पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह फाँसी दी गई .
इस प्रकरण में 16 अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम 4 वर्ष की सजा से लेकर अधिकतम काला पानी (आजीवन कारावास) तक का दण्ड दिया गया था।
काकोरी-काण्ड में भाग लेने वाले के प्रमुख क्रान्तिकारी थे - पं.राम प्रसाद 'बिस्मिल' ,अशफाक उल्ला खाँ, योगेशचन्द्र चटर्जी, प्रेमकृष्ण खन्ना, मुकुन्दी लाल, विष्णुशरण दुब्लिश, सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य, रामकृष्ण खत्री, मन्मथनाथ गुप्त, राजकुमार सिन्हा, ठाकुर रोशानसिंह, राजेन्द्रनाथ लाहिडी, गोविन्दचरण कार, रामदुलारे त्रिवेदी, रामनाथ पाण्डेय, शचीन्द्रनाथ सान्याल,भूपेन्द्रनाथ सान्याल एवं प्रणवेशकुमार चटर्जी.
इन (राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह) क्रांतिकारियों के बलिदान दिवस पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि.
🙏🙏🙏
