किशोरवय में मेरे बाबााजी (grand father )ने मुझे एक कहानी सुनायी थी-
गंगा नदी के किनारे किसी कुंभ मेले की बात है.एक मालिन अपने बेटे की अंगुलि पकड़े ,सिर पर फूलों का टोकरा रखे गंगा तट पर फूल बेचने के लिये जा रही थी ,अचावक उसके बेटे को दीर्घशंका महसूस हुई. मालिन ने इधर - उधर देख कर यात्रा मार्ग के किनारे सुनसान जगह बेटे को बिठा दिया. बाद में विष्ठा पर उसने ढेर सारे पुष्प डाल दिये और आगे बढ़ गयी.
पीछे आने वाले तीर्थ यात्रियों ने जब वहॉ पुष्पों का ढेर देखा,तो उन्हें लगा कि यह कोई पूजा का पवित्र स्थान है. वे उस पर पुष्प और पैसे अर्पित करने लगे. गंगा के किनारे रहने वाले मुस्लिमों को भी लगा कि यह कोई सिद्ध पीर का स्थान है,वे भी उस पर फूल व पैसे डालने लगे.
जब वहॉ धन एकत्र होने लगा तो एक गेरुआधारी वहॉ आकर बैठ गये और कहने लगे कि यह मेरे गुरु की समाधि है और मै उनका उत्तराधिकारी हूँ. मुस्लिमों ने जब यह देखा तो एक जालीदार टोपी पहने सज्जन भी यह दावा करने लगे कि यह उनके पीर की दरगाह है.
मामले को सांप्रदायिक रंग लेते देख प्रशासन सक्रिय हुआ. यह निर्णय हुआ कि फूलों को हटा कर देखा जाये कि नीचे क्या है.जब असलियत सामने आयी तो दोनों दावेदार व उनके समर्थक बहुत शर्मिंदा हुये.
बाबा जी कहते थे कि अविवेकपूर्ण आस्था अंध श्रद्धा को जन्म देती है.
मुझे लगता है इसी प्रकार राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर अविवेकपूर्ण समर्थन अथवा विरोध ,अंध भक्ति व अंध विरोध को जन्म देता है जो न व्यक्ति के अपने हित में होता है ,और न समाज के.
आज सुबह न्यूज सुनते समय फिल्म पद्मावती पर रोक पर दायर याचिका को अस्वीकार करते हुये माननीय सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुये फिल्म को बिना देखे हुये बवाल पर माननीयों की भूमिका पर सवाल खड़े करते हुये उन्हें जिस तरह लताड़ा है. और जिस तरह विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री राजनीतिक हित के लिये इस बवाल पर जो रुख अपना रहे हैं,उससे मुझे बचपन में सुनी कहानी याद आ गयी.
फिर नाक,कान काटने की धमकी व उस पर इनाम की घोषणा करना तो शायद हमारे यहॉ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है.
Tuesday, November 28, 2017
एक कहानी सुनिये
Monday, November 20, 2017
फिल्म पद्मावती का विरोध -एक मीमांसा
फिल्म पद्मावती के माध्यम से इतिहास से जन भावनाओ को आहत करने की हद तक छेड़छाड़ करने वाले फिल्मकारों को कई विद्वानों व इतिहासकारों ने लताड़ा है. मै भी इससे सहमत हूँ.
पर हमारे देश के लोकतंत्र में हर बात राजनीति से जुड़ जाती है. राजनीतिक दल भी अपने हितलाभ की दृष्टि से समर्थन व विरोध करने लगते है. इस समय इस मुद्दे पर राजपूत वर्ग राजनीति पर असर डालने वाले एक दवाव समूह ( pressure group )के रूप में संगठित हुआ है. सभी दल इस ग्रुप का समर्थन चाहते हैं. गुजरात चुनाव सत्ता दल व विरोधी दल के बीच नाक का सवाल बन गया है.इस मुद्दे को वे भी cash कराना चाहते हैं.
हमारे यहॉ समर्थन व विरोध जब भी होता है तो विवेकशून्यता की हद तक. बिना फिल्म देखे व निर्देशक की सफाई सुने, विरोध जारी है ,फिल्म के निर्देशक का भी और मुख्य पात्रों की भूमिका निभाने वाले कलाकारों का भी. स्त्री अस्मिता के सम्मान के नाम पर शुरू हुआ विरोध फिल्म की हीरोइन के प्रति भद्दी बातों व सिर काट कर लाने वाले को इनाम देने जैसे तालिबानी फरमानों तक पहुँच गया है.कई विद्वान इतिहासकार ने भी इस पर मौन रहना या इसकीउपेक्षाकरनाउचितसमझा.
कलाकार तो निर्देशक के निर्देशन में भूमिका निभाते हैं पात्र को जीने का प्रयास करते हैं फिर उन पर व्यक्तिगत प्रहार क्यों?दीपिका पद्मावती नहीं है और न रणवीर ,खिलजी. गुजरात चुनाव के बाद देखियेगा,कि एक-दो सीन काट कर यह फिल्म रिलीज हो जायेगी और इस विवाद का भी फिल्म को लाभ मिलेगा. हॉ पद्मावती फिल्म के खिलाफ मुहिम चलाने वाले कुछ करणी सेना के नेताओं की राजनीति में कीमत जरूर बढ़ जायेगी.
मेरा सकारात्मक सोच रखने वाले विद्वानों व जागरूक नागरिकों से मेरी यह अपील जरूर है कि बिना तथ्यों का निष्पक्ष अध्ययन किये ,ऐसे मुद्दों को समर्थन या विरोध करने से पहले सोचें जरूर. ऐसी बवालों पर देश का ही नुकसान होता है. मुख्य मुद्दे पीछे छूट जाते हैं. सत्ताधीश युगों से समाज को बॉटने की नीति पर चलते रहे रहे हैं, यह हमें सोचना होगा.
Monday, October 2, 2017
भारतीय स्वाधीनता के पुरोधा -महात्मा गांधी
आज राष्ट्रपिता महात्मा गॉधी की जयंती है.स्वाधीनता आंदोलन में गॉधी जी का एक युग रहा है.उन्होंने अंग्रेजों की दमनकारी नीति का मुकाबला सत्य,अहिंसा, नैतिकता व आत्मबल पर आधारित 'सत्याग्रह आंदोलन' के माध्यम से किया और ब्रिटिश सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर किया.
उन्होंने भारतीय जनता के मनोविग्यान को समझा था,जो किसी भी प्रकार की हिंसा व उग्रता को नापसंद करती थी,सामंजस्य ,भाईचारे व वसुधैव कुटुंबकम् में आस्था रखती थी और जिसे न समझ पाने के कारण भारत के क्रांतिकारी आंदोलन आम लोगों का समर्थन न पा पाने के कारण असफल हो गये और स्वाधीनता के अनेक नायकों को फॉसी पर चढ़ना पड़ा.
गॉंधी जी ने राजनीति में नैतिकता के मानदंडों का समावेश किया यथा- सत्य,अहिंसा,साधनों की पवित्रता,कथनी-करनी में अभेद,सर्व-धर्म-समभाव. उन्होने 'Example is better than precept'की उक्ति का अनुसरण कर इन सिद्धांतों को जीवन में उतारा था जिसके कारण वे आम जनता को आकर्षित करने में एवं उसे सत्याग्रह आंदोलन से जोड़ने में सफल हुये.गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर ने उन्हें 'महात्मा' कहा और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने उन्हें 'राष्ट्रपिता' कह कर संबोधित किया. पश्चिमी देशों के लिये गॉधी जी की शैली एक करिश्मे से कम न थी. उनकी सत्याग्रह की पद्धति का बाद में अनेक देशों के स्वाधीनता आंदोलन में प्रयोग हुआ.
गॉधीजी भारत के विभाजन के विरोधी थे.मौलाना आजाद भी इसी मत के थे. पर नेहरू व पटेल जैसे नेताओं ने विभाजन को स्वीकार कर लिया जिसका परिणाम आज भी भारत भोग रहा है. जब सारा देश स्वतंत्रता प्राप्ति का जश्न मना रहा था,गॉधी जी नोआखाली में सांप्रदायिक सदभाव स्थापित करने में जुटे थे.उन्होने आमरण अनशन भी शुरू किया जिसका व्यापक प्रभाव पड़ा.
30 जून 1948 को नाथूराम गोडसे ने गॉधी जी की हत्या कर दी और एक युग का अंत हुआ.उस समय पाकिस्तान रेडियो ने यह मर्सिया पढ़ा-
"ऐ कौम! न छूटेगा ,दामन से तेरे यह दाग ,
गुल तूने अपने हाथ से, अपना किया चिराग,
गॉधी को मार कर ,तूने तो तोड़ा है वह फूल,
तरसेगा. लहलहाने को एशिया का बाग."
देश के आज के राजनीतिक परिवेश में गॉधी जी केवल उपयोग की वस्तु रह गये हैं. उनके सिद्धांतों को तिलांजलि देकर उनके नाम को भुनाया जा रहा है. कांग्रेस ने भी यही किया और वर्तमान सरकार भी यही कर रही है.सरकार उनका नाम जप रही है और उसके समर्थकों का एक वर्ग उनकी निंदा व चरित्र हनन में लगा है.यह स्थिति निंदनीय है. गॉंधी देश का गौरव हैं और रहेंगे.
Saturday, September 30, 2017
'मंजुल मयंक 'जी को विनम्र श्रद्धांजलि
आज बुन्देलखंड ( हमीरपुर निवासी ) के सुमधुर गीतकार श्री ग़णेश प्रसाद खरे ' मंजुल मयंक' का जन्मदिवस एवम पुण्यतिथि दोनों है.मयंक जी एक सीधे,सरल इंसान व हिंदी साहित्य के उदभट विद्वान व राष्ट्रीय स्तर के कवि रहे हैं.वे सुप्रसिद्ध कवि श्री गोपाल दास 'नीरज' के साथी रहे हैं बुंदेलखंड की इस महान विभूति को शत शत नमन.
मेरे अग्रज स्व. आदर्श 'प्रहरी ' ने मयंक जी को निम्नांकित पंक्तियों में श्रद्धांजलि दी थी-
"गीत में जो दर्द गाते हैं,
उन्हें मेरा नमन है,
दर्द नें जो मुस्कुराते है,
उन्हें मेरा नमन है,
जो व्यथाओं में कथाओं की ,
नई नित सृष्टि करते,
मान्यताओं को बनाते हैं,
उन्हें. मेरा नमन है."
ऐसे युग कवि को मेरा शत शत नमन
प्रस्तुत है 'मयंक 'जी का एक बेहद लोकप्रिय गीत-
"रात ढलने लगी चॉद बुझने लगा"
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"रात ढलने लगी, चाँद बुझने लगा,
तुम न आए, सितारों को नींद आ गई ।
धूप की पालकी पर, किरण की दुल्हन,
आ के उतरी, खिला हर सुमन, हर चमन,
देखो बजती हैं भौरों की शहनाइयाँ,
हर गली, दौड़ कर, न्योत आया पवन,
बस तड़पते रहे, सेज के ही सुमन,
तुम न आए बहारों को नीद आ गई ।
व्यर्थ बहती रही, आँसुओं की नदी,
प्राण आए न तुम, नेह की नाव में,
खोजते-खोजते तुमको लहरें थकीं,
अब तो छाले पड़े, लहर के पाँव में,
करवटें ही बदलती, नदी रह गई,
तुम न आए किनारों को नींद आ गई ।
रात आई, महावर रचे साँझ की,
भर रहा माँग, सिन्दूर सूरज लिए,
दिन हँसा, चूडियाँ लेती अँगडाइयाँ,
छू के आँचल, बुझे आँगनों के दिये,
बिन तुम्हारे बुझा, आस का हर दिया,
तुम न आए सहारों को नीद आ गई ।"
👣🙌🏻🙏
Monday, September 18, 2017
शाबाश पी.वी.सिंधू
कल 17 सितंबर 2017 का दिन देशवासियों के लिए कई अच्छी खबरें लेकर आया. गुजरात में सरदार सरोवर बॉध को प्रधानमंत्री जी ने देश को समर्पित किया.वहीं खेल जगत में भारतीय क्रिकेट टीम ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ लगभग हारा हुआ पहला वन डे शुरूआती बल्लेबाजों के पू्र्ण धराशायी होने के बाद भी धोनी व पांड्या की सूझबूझ भरी बल्लेबाजी के कारण जीत लिया.
परंतु सबसे महत्वपूर्ण खबर ,जिसे मीडिया चैनल्स में सबसे कम स्थान मिला, पिछले ओलंपिक की रजत पदक विजेती पी.वी.सिंधू का कोरिया ओपन सुपर सीरीज बैडमिंटन टूर्नामेंट में महिला एकल में विश्व बैडमिंटन चैंपियन जापान की नोजोमी ओकुहारा को हरा कर इस खिताब को जीतना था. विश्व चैंपियन फायनल में वे इसी खिलाड़ी से हार गयी थीं. सियोल में हुये इस आयोजन में उन्होंने अपना बदला चुका कर इतिहास रचा.
सिंधू अब तक तीन सुपर सीरीज खिताब जीत चुकीं हैं जिनमें से दो खिताब इसी वर्ष जीते हैं. प्रत्येक भारतवासी को सिंधू की उपलब्धि पर नाज होना चाहिये. वे देश का गौरव हैं
Sunday, September 3, 2017
देश की नई रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण
प्रधानमंत्री जी ने सारे राजनीतिक पूर्वानुमानों को ध्वस्त करते हुये सुश्री निर्मला सीतारमण को देश का रक्षा मंत्री बना दिया. वे देश की पहली पूर्णकालिक महिला रक्षा मंत्री हैं .इससे पहले स्व. इन्दिरा गान्धी कुछ समय रक्षा मंत्री रही थीं.
निर्मला जी भारत के कई राज्यों का प्रतिनिधित्व करती हैं. इनका जन्म तमिलनाडू में हुआ. वे केरल से स्नातक हैं. इनकी ससुराल आंध्र में है और संसद में वे कर्नाटक दे राज्य सभा की सदस्य हैं .जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय ,नई दिल्ली में भी उन्होने शिक्षा ग्रहण की.
नितिन गडकरी जब भाजपा के अध्यक्ष थे, तब पहली बार उन्हें भाजपा का प्रवक्ता बनाया गया. जिसका उन्होने बखूबी निर्वाह किया. उसके बाद उन्होने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. मोदी जी के मंत्रिमंडल में वे कैबिनेट मन्त्री बनी. उनकी क्षमता व कुशलता के कारण मंत्रिमंडल के हाल के फ़ेरबदल में उन्हें रक्षा मंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद दिया गया. उन्हें ढेरों शुभकामनाये.
इसे महिला सशक्तीकरण की दिशा में भी एक बडे कदम के रूप में भी देखा जा सकता है. महिलायें अब पुरुषों के काम करने लगी हैं.भले ही मोदी जी की अपनी पत्नी को साथ न रखने पर आलोचना होती हो पर इस देश की सरकार में विदेशमंत्री व रक्षा मंत्री महिलायें हैं.और गृहमंत्री पुरूष.यह मोदी जी के मंत्रिमंडल की विलक्षण विशेषता दृष्टिगोचर हो रही है.
Saturday, August 26, 2017
जेल में बाबा ---हिंसा से सकते में सरकार
भारत में तथाकथित बाबाओं की काली करतूतों की श्रृंखला में बाबा 'रामरहीम' का नाम आज सबसे ऊपर है . वोटों के लालच में राजनेताओं का इन बाबाओं से प्रेम जग जाहिर हो चुका है. पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देश के बाद भी उनके भक्तों को एकत्र होने देना और जैसी कि आशंका थी, कोर्ट के फैसले के बाद हिंसा होना ,सरकार की नाकामी का सूचक है. हाईकोर्ट ने पुन: सरकार को फटकार लगाते हुये कहा कि उसने राजनीतिक लाभ की दृष्टि से हिंसा होने दी.
अब रामरहीम जेल में हैं. कोर्ट ने सरकार को उनकी संपत्ति जब्त करने व उससे हिंसा में हुये नुकसान की भरपायी करने का आदेश दिया है.
हद तो यह है कि कुछ महाराज टाइप के सांसद इन बाबा के मामले में न्यायपालिका को कोस रहे हैं. उनका कहना है कि न्यायपालिका को निर्णय देते समय जनभावनाओं का ध्यान रखना चाहिये .यह सांसद भाजपा के हैं और विवादास्पद बयान देने में माहिर हैं. बयान देते समय वे यह भी भूल गये कि इस प्रकरण की सी.बी.आई. जॉच का आदेश उनकी पार्टी के इतिहास पुरुष पूर्व प्रधानमंत्री श्रीअटल बिहारी बाजपेयी ने ही दिये थे.
सच तो यह है कि न्यायपालिका ही इस देश के संविधान को बचाये हुये है,वरना राजनेता तो वोटों के लालच में देश का बंटाधार ही कर दें.
लोकप्रिय कवि प्रदीप ने छह दशक पहले अपने गीत 'कितना बदल गया इंसान ' गीत में निम्नांकित पंक्तियॉ लिखी थीं वे आज उस समय से अधिक प्रासंगिक सिद्ध हो रहीं हैं.
"राम के भक्त रहीम के बंदे,
रचते आज फ़रेब के फंदे.
कितने ये मक्कार ये अंधे,
.देख लिये इनके भी धंधे.
इन्हीं की काली करतूतों से
बना ये मुल्क मशान.
कितना बदल गया इंसान।"