हम भारतीय 'लोकतंत्र' को अब तक सही अर्थों में आत्मसात नहीं कर सके हैं. हम सदियों से राजतंत्रीय व्यवस्था के आदी रहे हैं और शासक में देवत्व व उसे नायक के रूप में देखने की हमारी आदत रही है. लोकतन्त्र हमारे मनोविग्यान के अनुकूल नहीं हैं. जिससे हम खुश होते हैं उसके भक्त हो जाते हैं और उसके खिलाफ़ एक शब्द भी नहीं सुनते और जब नाराज हो जाते हैं तो उसी hero को zero बनाने में देर नहीं लगती. इंदिरा गांधी,राजीव गॉधी और विश्वनाथ प्रसाद सिंह ने जनता के इन दोनों रूपो को झेला था.
लोकतंत्र केवल चुनाव में वोट डालना ,चुनाव लड़ना व चुनाव मे जीत कर सरकार बनाना ही नहीं है.लोकतंत्र में आलोचना पर ध्यान देकर सरकार को अपनी कमियों को दूर करने का अवसर मिलता है.सतत् जागरूकता ही लोकतंत्र की कुंजी है. इसके लिये विवेकपूर्ण जनमत का निर्माण होना अत्यन्त आवश्यक है.
आज भारत की विश्व में जो स्वीकार्यता है वह केवल मोदी जी के तीन वर्ष के शासनकाल में नहीं बनी है.कांग्रेस के लंबे शासन का और अटल जी के कार्यकाल का भी इसम महत्वपूर्ण योगदान है.सुषमा स्वराज जी ने हाल ही में UNO में अपने भाषण में बड़ी ईमानदारी से इसे स्वीकार किया भी है.
लोकतंत्र एक स्वयंसुधारक व्यवस्था है .UK, जिसे लोकतंत्र का घर कहा जाता है, में सरकार भी संप्रभु (crown )की कहलाती है ,और विरोधी दल ( shadow cabinet) भी crown का.
आलोचना व विरोध सरकार को अपनी कमियों में सुधार का अवसर प्रदान करता है और कभी- कभी जनमत की इच्छा को भी अभिव्यक्त करता है जिसके सामने सरकार को नतमस्तक होना पड़ता है.प्रसिद्ध राजनीतिक विचारक गिलक्राइस्ट( Gilchrist) का कथन याद आ रहा है ,
"प्रत्येक वैधानिक संप्रभु के पीछे एक राजनैतिक संप्रभु होता है, जिसके सम्मुख वैधानिक संप्रभु को नतमस्तक होना पड़ता है ."
इस राजनैतिक संप्रभु में विरोधी दल, दबाव समूह, हित समूह, trade unions, व्यापारिक समूह आते हैं.
विपक्ष तो आलोचना करता ही है. मनमोहन सिंह की सरकार के समय आधारकार्ड की अनिवार्यता, GST पर विरोध व संसद की कार्यवाही ठप्प करने का काम विरोधी दल भाजपा ने जिस प्रभावी ढंग से किया, वर्तमान विरोधी पक्ष तो उसका दशांश भी नहीं कर पाया. इन्हीं मोदी जी ने जी. एस. टी. व आधार कार्ड का मुखर विरोध किया था जिसके वीडियो भी सोशल मीडिया पर दिखाई दिये हैं.
सरकार में आने पर जिम्मेदारी बढ़ती है. राष्ट्रीय हित के हिसाब से नीतियॉ बनानी पड़ती है.नीतियों की आलोचना को भी सहन करना पड़ता है.
आज आम लोग महसूस कर रहे हैं कि शासन की नीतियॉ बडे व्यापारिक घराने के हित में अधिक हैं ,छोटे व्यापारियों,व आम लोगों के हित में कम . यदि लोग कार्टून व व्यंग्य के माध्यम से अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति करते हैं,तो उसको खेल भावना से लेना चाहिये. आखिर आर. के.लक्ष्मण व बाल ठाकरे एक कार्टूनिस्ट के तौर पर ही तो लोकप्रिय रहे थे जिन्होने अपने समकालीन सभी राजनेताओं पर कार्टून बनाये थे और कोई भी बुरा नहीं मानता था.
आज मोदी जी के ऊपर जरा सी भी व्यंग्य उनके समर्थकों को सहन नहीं हो रहा है.एक कार्यक्रम में मेरे एक वरिष्ठ ने कहा कि प्रधानमंत्री सारे देश का होता है अत: उसकी आलोचना नहीं होनी चाहिये. वे यह भूल गये कि पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को विरोधीदलों ने क्या नहीं कहा, जबकि जिन घोटालों पर कांग्रेस को बदनामी मिली वे मनमोहन सिंह के काल में ही उजागर हुये थे और उनसे संबंधित लोगों पर कार्यवाही भी शुरू हो गयी थी. जब भारत में मोदी जी का राजतिलक हो रहा था उसी के आस-पास जापान में मनमोहन सिंह को विश्व का Best Primeminister of the World का सम्मान दिया जा रहा था.
मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि यह देश के प्रधानमंत्री का कर्तव्य है कि वह देश हित में काम करे. मोदी जी भी वही कर रहे हैं जो देश के पूर्व प्रधान मन्त्रियो ने किया. कई पूर्व प्रधान मन्त्री गठबंधन सरकार चला रहे थे जिसकी अपनी मजबूरियॉ या दबाव थे.पर जब कभी किसी प्रधानमंत्री को पूर्ण बहुमत मिला, उसकी कार्य प्रणाली अलग दिखी. यह बात इन्दिरा जी, अटल जी और मोदी जी की कार्य प्रणाली में दिखाई दी.
मोदी जी देश के ऐसे प्रधानमंत्री बने जिन्होने विश्व के अधिकांश देशों का दौरा किया और उन्हें भारत से जोडा. भारत के व्यापारिक हितो का संवर्धन हुआ. भारत की सुरक्षा को सुदृढ़ करने व सामरिक शक्ति बढ़ाने के प्रयास जारी हैं.
पर यहॉ मै एक बात महसूस कर रहा हूँ कि सबको ,विशेषकर अमेरिका को , साधने की कोशिश में हमने रूस जैसा मित्र खो दिया.
1971में पाकिस्तान युद्ध के समय अमेरिकी सॉतवें बेड़े की धमकी के जबाब में पूर्व सोवियत संघ ने भारत के समर्थन में युद्ध में कूदने की धमकी देकर अमेरिका को चेतावनी दी थी और अमेरिका को चुप होना पड़ा था .क्या आज चीन के आक्रमण करने की स्थिति में इस हद तक साथ देने वाला कोई विश्वसनीय मित्र आज हमारे पास है?
मित्रो! आज हमारे सामने आंतरिक व बाह्य अनेक चुनौतियॉ हैं. हमारा दायित्व यही होना चाहिये कि हम अंध समर्थन व अंध विरोध से मुक्त होकर देशहित में सकारात्मक दृष्टिकोण अपना कर निष्प होकर सही बात कहे , सही बात का समर्थन करें तथा नकारात्मक व गलत बातों का विरोध करें. तभी हम विवेकशील जनमत के निर्माण में अपना योगदान दे सकते हैं. सोशल मीडिया इसके लिये एक महत्वपूर्ण माध्यम सिद्ध हो सकता है.
Wednesday, July 1, 2020
आइये सही मायनों में लोकतांत्रिक बनें
बहुमुखी प्रतिभा के धनी-डा. बिधान चंद राय
Sunday, June 28, 2020
भारत में आर्थिक सुधारों के पुरोधा - श्री पी. वी. नरसिंह राव
Saturday, January 26, 2019
आइये! ' गणतंत्र' को समझें
सारा देश आज 70वां ' गणतंत्र दिवस ' मना रहा है .हम 15 अगस्त को 'स्वतंत्रता दिवस' भी मनाते हैं .दोनों दिवसों की अलग -अलग महत्ता है .
' स्वाधीनता ' विदेशी शासन के साथ लम्बे संघर्ष में हमारे अनगिनत वीरों की कुर्बानियों का परिणाम है . 15 अगस्त को हमें विदेशी गुलामी से मुक्ति मिली. इसलिये इस दिन हम 'स्वतंत्रता दिवस' मनाते हैं ...
जब किसी से यह पूछा जाता है कि हम गणतंत्र दिवस क्यूँ मनाते हैं ? तो प्राय: एक ही जबाब आता है कि आज के दिन हमारा संविधान लागू हुआ था ....अधिकतर कार्यक्रमों में वक्ताओं के भाषण दोनों दिवसों पर एक जैसे होते हैं ....नेता व अधिकारी भी इनके फर्क को बहुत कम जानते हैं.
यह सच हैं कि आज के दिन हमारा संविधान लागू हुआ था .पर इस संविधान ने हमारे देश एक 'गणतंत्र' घोषित किया था .अत:संविधान को जानने के लिये हमें ' गणतंत्र ' को जानना ज़रूरी है.
विश्व इतिहास के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि अधिकतर देशों में पहले 'राजतंत्र' ही थे .समय के साथ राजतंत्र का लोकतंत्रीकरण सबसे पहले ब्रिटेन में हुआ जहां सीमित राजतंत्र को अपनाया गया है .जबकि लोकतंत्र का घर ब्रिटेन को ही माना जाता है .
'संयुक्त राज्य अमेरिका' विश्व का सबसे पहला राज्य था जिसने स्वयं को 'गणतन्त्र' था .उसके बाद कई राज्यों ने गणतंत्र घोषित किया . फ्रांस,भारत, चीन , रूस सभी गणतांत्रिक राज्य हैं.
गणतंत्र (Republic) को परिभाषित करते हुए Encyclopedia of Britainica में बताया गया है कि गणतंत्र वह लोकतांत्रिक प्रणाली है ज़िसकी दो प्रमुख विशेषतायें होती हैं -
प्रथम , राज्य प्रधान जनता द्वारा निर्वाचित( प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ) होता है ,
द्वितीय , राज्य प्रधान वंशानुगत नहीं होता .
हमारे देश में भी गणतांत्रिक संविधान अंगीकृत किया गया है इसका अर्थ है कि भारत के प्रत्येक नागरिक को यह अवसर प्राप्त है कि वह अपनी योग्यता व क्षमता के आधार पर बिना किसी भेदभाव राज्य के सर्वोच्च पद( राज्य प्रधान) पर पहुँच सके .
हमारे देश में विभिन्न दलित व पिछड़े वर्गों के व्यक्ति भी राष्ट्रपति के रूप में राज्य प्रधान के सर्वोच्च पद पर पहुचे हैं जैसे - आर के नारायणन ( दलित S C ). ग्यानी जैल सिंह ( बढ़ई ).कलाम साहब (मछुआरा परिवार )और वर्तमान में कोविंद जी.यह गणतंत्र में ही संभव है .
ब्रिटेन ,जापान,स्पेन ,आस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे राज्य लोकतांत्रिक जरूर हैं पर इन देशों में राज्य प्रधान वंशानुगत होता है .अत: ये राज्य सीमित राजतंत्र की श्रेणी में आते हैं.
26 जनवरी 1950 के दिन संविधानसभा ने हमारे देश के लिये एक ऐसे गणतान्त्रिक संविधान को अंगीकृत किया था जो संप्रभु, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष,लोकतांत्रिक व गणतंत्र के निर्माण का वचन देता है ज़िसमें सभी को स्वतंत्रता ,समानता व न्याय की सुरक्षा मिले .,सभी भाईचारे के साथ रहें .भारतीय संविधान की प्रस्तावना उक्त बातो को उदघोषित् करती है .
इसी कारण हम 'गणतंत्र दिवस' मनाते हैं
Thursday, November 1, 2018
पटेल एवं नेहरू
सरदार वल्लभ भाई पटेल और पं जवाहर लाल नेहरू के संबंधों पर कुछ लोग हमेशा से भ्रमपूर्ण टिप्पणियाँ करते रहे हैं. जो कि निम्नांकित हैं. इनमें सत्यता बहुत कम है -
1. सरदार पटेल को पं नेहरू ने प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया.
स्वतंत्रता के समय सरदार पटेल की आयु 72 वर्ष हो चुकी थी और उन्हें एक बार दिल का दौरा पड़ चुका था. महात्मा गांधी सरदार पटेल की बीमारी और उनकी शारीरिक क्षमता को जानते थे अतः उन्होंने 58 वर्षीय पं नेहरू को भारत का पहला प्रधानमंत्री बनाया जिस पर पटेल ने भी सहमति व्यक्त दी. संगठन में पटेल की पूरी पकड़ थी. उन्होने गृह मंत्री व उपप्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के नेतृत्व में पूरी निष्ठा से कार्य किया.
महात्मा गांधी की दूरदृष्टि सही सिद्ध हुई और जनवरी 1948 में नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या के सदमे को सहन न कर पाने के कारण मार्च 1948 के पहले हफ्ते में ही सरदार पटेल को दिल का दूसरा दौरा पड़ा.उस समय आज जैसी सुविधाएं देश में मौजूद नहीं थी. सरदार पटेल के होश में आने तक पं नेहरू लगातार उनके पास बैठे उनका सर सहलाते रहे और रो रहे थे. स्वतंत्रता प्राप्ति के 3 वर्षों के अंदर ही 1950 में लंबी बीमारी के बाद सरदार पटेल का देहावसान हो गया.
2. सरदार पटेल को पं नेहरू और कांग्रेस ने सम्मान नहीं दिया.
यह ऐसा झूठ है जो लोगों में भ्रम फैला रहा है.इस संबंध में निम्नांकित तथ्य द्रष्टव्य हैं .
(अ ) सरदार पटेल की स्मृति में पं नेहरू और कॉन्ग्रेस की सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च करके गुजरात में सरदार सरोवर बांध का निर्माण कराया, जिससे मध्यप्रदेश और गुजरात के लाखों किसानों को पानी उपलब्ध हुआ और दोनों प्रदेशों का सिंचित क्षेत्र 25% बढ़ गया. यह किसानों के नेता सरदार पटेल को पं.नेहरू द्वारा दी गई सबसे बड़ी श्रद्धांजलि थी.
(ब )सरदार पटेल देश के पहले गृह मंत्री थे और उनके नाम पर देश में आईपीएस अफसरों की ट्रेनिंग करने वाली संस्था को सरदार पटेल का नाम देकर पं नेहरू ने सरदार पटेल को स्मृति शेष रखा.
(स) अहमदाबाद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम सरदार पटेल के नाम पर रखकर कांग्रेस ने सरदार पटेल को एक और श्रद्धांजलि दी.
( द) सरदार पटेल को देश के इतिहास में उचित सम्मान देते हुए पं नेहरू सरदार पटेल के परिवार को भी नहीं भूले थे.सरदार पटेल के पुत्र और पुत्री दोनों को पं नेहरू ने तीन-तीन बार सांसद बनाया.
आज देश में कोई बड़ा शहर ऐसा नहीं होगा जहां पर सड़क, चौराहे, अस्पताल, स्कूल, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, सरदार पटेल के नाम पर न हो.
सरदार पटेल और पंडित नेहरू के संबंधों के बारे में बात करते हुए हम अक्सर यह भूल जाते हैं सरदार पटेल और पंडित नेहरू की उम्र में 14 वर्ष का अंतर था. .......महात्मा गांधी, सरदार पटेल, मदन मोहन मालवीय और मोतीलाल नेहरू आदि हम उम्र और मित्र थे, ये कांग्रेस की एक पीढ़ी के नेता थे.
दूसरी पीढ़ी में पंडित नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, जयप्रकाश नारायण आदि आते थे जो उम्र में काफी कम थे और युवा थे.
मोतीलाल नेहरू का समकालीन होने के कारण सरदार पटेल , महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय आदि पंडित नेहरू के लिए पितृ तुल्य रहे.
जब हैदराबाद के बदले में सरदार पटेल पाकिस्तान को कश्मीर देने पर तैयार हो गए थे तब पंडित नेहरू ने पूरी नम्रता से सरदार पटेल को मनाया कि ऐसा करना देश हित में नहीं होगा और सरदार पटेल ने अपना पूरा स्नेह पंडित नेहरू पर लुटाते हुए पंडित नेहरू की बात मान ली.
जब महात्मा गांधी की हत्या के बाद सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगा दी थी तब पुनः पं नेहरू का अनुरोध मानकर सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर से सशर्त वह पाबंदी हटाई.
सरदार पटेल और पं नेहरू की तुलना का कोई औचित्य नहीं है और यह तुलना की भी नहीं जानी चाहिए .
स्वतंत्रता के बाद रियासतों के देश में एकीकरण में सरदार पटेल की योगकारी भूमिका रही पर स्वतंत्र भारत के पुनर्निर्माण में जहाँ सरदार पटेल ने अपने जीवन के मात्र 3 वर्ष ही दे सके वहीं पंडित नेहरू को अपने जीवन के 17 वर्ष देने का अवसर मिला . इसलिये पंडित नेहरू को आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है .
पिछले कुछ वर्षों में देश में एक बात अच्छी हुई है कि वर्तमान सरकार व आर. एस. एस. के नेताओं ने कांग्रेस से जुड़े महापुरुषों और स्वतंत्रता सेनानियों जैसे सरदार पटेल, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और क्रांतिकारियों जैसे -चंद्र शेखर आजाद, सरदार भगत सिंह आदि को सम्मान देना शुरू कर दिया है, और देश की स्वतंत्रता में उनके योगदान को रेखांकित करना शुरू किया है.
आज निष्पक्ष होकर हमारे देश की स्वतंत्रता व निर्माण में योगदान देने वाले मनीषियों की भूमिका को जानने व समझने की जरूरत है ....न कि उन्हें प्रदेश, जाति व सीमित राजनीतिक हितों की पूर्ति के उद्देश्य से बॉट कर देखने की.
Wednesday, October 31, 2018
लौह पुरुष एवं लौह महिला को नमन
आज 31 अक्टूबर भारतीय इतिहास में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने के लिये प्रसिद्ध दो हुतात्माओं के स्मरण का दिवस है जो लौह पुरुष और लौह महिला के खून में जाने जाते हैं.
आज देश के पहले उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल का जन्मदिवस है जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद देशी रियासतों के भारत में विलय की प्रक्रिया को कुशलता से संपादित किया. वे भारतीय अखंडता के अग्रदूत कहलाये जाते हैं.
आज देश की पहली महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गंधी का बलिदान दिवस भी है . इंदिरा जी की सफल विदेशनीति व कूटनीतिक कौशल के कारण ही 1971 में अमेरिका के तत्कालीन दत्तक पुत्र पाकिस्तान का विभाजन हुआ, उसे मुँह की खानी पड़ी. अमेरिका की अंतराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी किरकिरी हुई और वहॉ के तत्कालीन राष्ट्रपति निक्सन को स्वीकार करना पड़ा कि भारत अब एक महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है...... राष्ट्र की अखंडता बनाये रखने के लिये उनके समय में पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद के विरुद्ध ' आपरेशन ब्लू स्टार ' हुआ. आतंकवाद के विरूद्ध होने के कारण आज के दिन उनकी हत्या कर दी गयी.
आइये! ओछी ऱाजनीति को दरकिनार कर आज इन हुतात्माओं का स्मरण करें व उन्हें श्रद्धांजलि दें.
Sunday, July 15, 2018
उत्तर प्रदेश में लेखपालों की हड़ताल
लोकतंत्र में धरना प्रदर्शन, कार्य -बहिष्कार और जेल भरो आंदोलन सत्याग्रह आदि अधिकार एवं न्याय मांगने के माध्यम होते हैं। आजादी के समय महात्मा गांधी जी ने सत्याग्रह का तरीका अपनाया था जिसके सामने शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार बेबस हो गयी थी.
स्वतंत्रता के बाद भी अपनी मॉगों को मनवाने के लिये शांतिपूर्ण धरना, प्रदर्शन व आंदोलन के तरीके विभिन्न कर्मचारी संगठनों के द्वारा अपनाये जाते रहे हैं. प्राय:यह देखा गया है कि आंदोलन के दौरान आंदोलनकारी पुलिस की लाठी गोली खाने के बावजूद हिंसक नहीं होते हैं
यह भी देखा गया है कि आंदोलन, विरोध एवं कार्य बहिष्कार व हड़ताल के सहारे जितनी सफलता कर्मचारी संगठनों को मिल जाती है, उतनी आमलोगों को धरना प्रदर्शन करने पर जल्दी नही मिल पाती है। कहा जाता है -" संघे शक्ति कलियुगे" (कलियुग में सगंठन की शक्ति है) लोकतंत्र में संगठित होकर संघर्ष करने से प्राय: सफलता प्राप्त हो जाती है।
उत्तर प्रदेश में इस समय लेखपालों की हड़ताल चर्चा का विषय बनी हुयी है और सरकार ने इस हड़ताल पर रोक लगा दी है। इतना ही नहीं हड़ताली लेखपालों के खिलाफ एस्मा कानून के तहत मुकदमें दर्ज कराये जा रहे हैं और लेखपालों को बर्खास्त तक करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।.
लेखपाल पिछले कई दिनों से अपनी कुछ मांगों को लेकर सांकेतिक हड़ताल चला रहे थे लेकिन इधर उन्होंने हड़ताल के स्वरूप को उग्र कर दिया और सारा कामकाज बंद करके बेमियादी हड़ताल शुरू कर दी गई है।
यह देखा जा रहा है कि इस हड़ताल का प्रभाव सरकार पर कम ,आमजनता पर अधिक पड़ रहा है और सबसे ज्यादा असुविधा राजस्व मामलों में हो रही है। लोगों को जाति निवास एवं आय प्रमाण पत्र नही मिल पा रहे हैं।
सरकार भी जिद पर अड़ गयी है और उसने स्पष्ट कर दिया है कि पहले हड़ताल खत्म हो फिर आगे की बात हो .उसने कठोर कार्यवाही के संकेत भी दे दिये हैं.
वैसे लोकतंत्र में आंदोलन व हड़ताल को राष्ट्रहित में दबाया जा सकता है किन्तु जहॉ पर अधिकारों एवं हक की लड़ाई हो वहां पर आंदोलनकारियों की बात सुनकर उनकी उचित मांगों पर विचार करना भी सरकार का ही दायित्व होता है।
लेखपालों की माँगें अगर उचित हैं तो सरकार का दायित्व बनता है कि वह उन पर ध्यान दे ,क्योंकि सरकार जनता के साथ अपने कर्मचारियों की भी संरछक होती है. लेकिन लेखपालों का भी दायित्व है कि वे संगठन व आंदोलन को हथियार न समझ कर अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों का भी ध्यान रखें .
लेखपाल सीधे आमलोगों से जुड़ा राजस्व का प्रथम लोकसेवक होता है और उसकी पैमाइश एवं जाँच रिपोर्ट आदि पर अदालत सिर्फ बहस सुनती है।लेखपाल जनजीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पद होता है जिसकी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है तथा वह ग्राम पंचायत में प्रधान के सचिव की भूमिका निभाता है। लेखपालों की मॉगें कितनी जायज क्यों न हो ,उनकी हड़ताल से सबसेे अधिक असुविधा आम लोगों को ही हो रही है.
योगी सरकार ने इस हड़ताल पर सख्त रुख अख्तियार किया है. इससे लेखपालों में हड़कंप मच गया है. प्राय: यह देखा गया है कि जब चुनाव पास आते हैं तो विभिन्न संगठन अपनी मॉगों को पूरा करने का दबाव बनाने लगते हैं. इस संबंध में सरकार को एक संतुलित नीति अपनानी चाहिये. लोकतंत्र में सरकार शक्ति या दमन के जोर पर नहीं चल सकती. पर लोगों को जो अधिकार मिले हैं उनसे दुरुपयोग व ब्लैकमेल करने की भी छूट नहीं दी जा सकती है. शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना ही एकमात्र विकल्प है.