Wednesday, July 1, 2020

आइये सही मायनों में लोकतांत्रिक बनें


      हम भारतीय 'लोकतंत्र' को अब तक सही अर्थों में आत्मसात नहीं कर सके  हैं. हम सदियों से राजतंत्रीय व्यवस्था के आदी रहे हैं और शासक में देवत्व व उसे नायक के रूप में देखने की हमारी आदत रही है. लोकतन्त्र हमारे मनोविग्यान के अनुकूल नहीं हैं. जिससे हम खुश होते हैं उसके भक्त हो जाते हैं और उसके खिलाफ़ एक शब्द भी नहीं सुनते और जब नाराज हो जाते हैं तो उसी hero को zero बनाने में देर नहीं लगती. इंदिरा गांधी,राजीव गॉधी और विश्वनाथ प्रसाद सिंह ने जनता के इन दोनों रूपो को झेला था.
      लोकतंत्र केवल चुनाव में वोट डालना ,चुनाव लड़ना व चुनाव मे जीत कर सरकार बनाना ही नहीं  है.लोकतंत्र में आलोचना पर ध्यान देकर सरकार को अपनी कमियों को दूर करने का अवसर मिलता है.सतत् जागरूकता ही लोकतंत्र की कुंजी है. इसके लिये विवेकपूर्ण जनमत का निर्माण होना अत्यन्त आवश्यक है.
      आज भारत की विश्व में जो स्वीकार्यता है वह केवल मोदी जी के तीन वर्ष के शासनकाल में नहीं बनी है.कांग्रेस के लंबे शासन का और अटल जी के कार्यकाल का भी इसम महत्वपूर्ण योगदान है.सुषमा स्वराज जी ने हाल ही में UNO में अपने भाषण में बड़ी ईमानदारी से इसे स्वीकार किया भी है.
     लोकतंत्र एक स्वयंसुधारक व्यवस्था है .UK, जिसे लोकतंत्र का घर कहा जाता है, में सरकार भी संप्रभु (crown )की कहलाती है ,और विरोधी दल ( shadow cabinet) भी crown का.
    आलोचना व विरोध सरकार को अपनी कमियों में सुधार का अवसर प्रदान करता है और कभी- कभी जनमत की इच्छा को भी अभिव्यक्त करता है जिसके सामने सरकार को नतमस्तक होना पड़ता है.प्रसिद्ध राजनीतिक विचारक गिलक्राइस्ट( Gilchrist) का कथन याद आ रहा है ,
     "प्रत्येक वैधानिक संप्रभु के पीछे एक राजनैतिक संप्रभु होता है, जिसके सम्मुख वैधानिक संप्रभु को नतमस्तक होना पड़ता है ."
     इस राजनैतिक संप्रभु में विरोधी दल, दबाव समूह, हित समूह, trade unions, व्यापारिक समूह आते हैं.
       विपक्ष तो आलोचना करता ही है. मनमोहन सिंह की सरकार के समय आधारकार्ड की अनिवार्यता, GST पर विरोध व संसद की कार्यवाही ठप्प करने का काम विरोधी दल भाजपा ने जिस प्रभावी ढंग से किया, वर्तमान विरोधी पक्ष तो उसका दशांश भी नहीं कर पाया. इन्हीं मोदी जी ने जी.  एस. टी. व आधार कार्ड का मुखर विरोध किया था जिसके वीडियो भी सोशल मीडिया पर दिखाई दिये हैं.
     सरकार में आने पर जिम्मेदारी बढ़ती है. राष्ट्रीय हित के हिसाब से नीतियॉ बनानी पड़ती है.नीतियों की आलोचना को भी सहन करना पड़ता है.
     आज आम लोग महसूस कर रहे हैं कि शासन की नीतियॉ बडे व्यापारिक घराने के हित में अधिक हैं ,छोटे व्यापारियों,व आम लोगों के हित में कम . यदि लोग कार्टून व व्यंग्य के माध्यम से अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति करते हैं,तो उसको खेल भावना से लेना चाहिये. आखिर आर. के.लक्ष्मण व बाल ठाकरे एक कार्टूनिस्ट के तौर पर ही तो लोकप्रिय रहे थे जिन्होने अपने समकालीन सभी राजनेताओं पर कार्टून बनाये थे और कोई भी बुरा नहीं मानता था.
     आज मोदी जी के ऊपर जरा सी भी व्यंग्य उनके समर्थकों को सहन नहीं हो रहा है.एक कार्यक्रम में मेरे एक वरिष्ठ ने कहा कि प्रधानमंत्री सारे देश का होता है अत: उसकी आलोचना नहीं होनी चाहिये. वे यह भूल गये कि पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को विरोधीदलों ने क्या नहीं कहा, जबकि जिन घोटालों पर कांग्रेस को बदनामी मिली वे मनमोहन सिंह के काल में ही उजागर हुये थे और उनसे संबंधित लोगों पर कार्यवाही भी शुरू हो गयी थी. जब भारत में मोदी जी का राजतिलक हो रहा था उसी के आस-पास जापान में मनमोहन सिंह को विश्व का Best Primeminister of  the  World का सम्मान दिया जा रहा था.
       मेरे  कहने का तात्पर्य यह है कि यह देश के प्रधानमंत्री का कर्तव्य है कि वह देश हित में काम करे. मोदी जी भी वही कर रहे हैं जो देश के पूर्व प्रधान मन्त्रियो ने किया. कई पूर्व प्रधान मन्त्री गठबंधन सरकार चला रहे थे जिसकी अपनी मजबूरियॉ या दबाव थे.पर जब कभी किसी प्रधानमंत्री को पूर्ण बहुमत मिला, उसकी कार्य प्रणाली अलग दिखी.  यह बात इन्दिरा जी, अटल  जी और मोदी जी की कार्य प्रणाली में  दिखाई दी. 
       मोदी जी देश के ऐसे प्रधानमंत्री बने जिन्होने विश्व के अधिकांश देशों का दौरा किया और उन्हें भारत से जोडा. भारत के व्यापारिक हितो का संवर्धन हुआ. भारत की सुरक्षा को सुदृढ़ करने व सामरिक शक्ति बढ़ाने के प्रयास जारी हैं.
      पर यहॉ मै एक बात महसूस कर रहा हूँ कि सबको ,विशेषकर अमेरिका को , साधने की कोशिश में हमने रूस जैसा मित्र खो दिया.
     1971में पाकिस्तान युद्ध के समय अमेरिकी सॉतवें बेड़े की धमकी के जबाब में पूर्व सोवियत संघ ने भारत के समर्थन में युद्ध में कूदने की धमकी देकर अमेरिका को चेतावनी दी थी और अमेरिका को चुप होना पड़ा था .क्या आज चीन के आक्रमण करने की स्थिति में इस हद तक साथ देने वाला कोई विश्वसनीय मित्र आज हमारे पास है?
      मित्रो! आज हमारे सामने आंतरिक व बाह्य  अनेक चुनौतियॉ हैं. हमारा दायित्व यही होना चाहिये कि हम अंध समर्थन व अंध विरोध से मुक्त होकर देशहित में सकारात्मक दृष्टिकोण अपना कर निष्प होकर सही बात कहे , सही बात का समर्थन करें तथा नकारात्मक व गलत बातों का विरोध करें. तभी हम विवेकशील जनमत के निर्माण में अपना योगदान दे सकते हैं. सोशल मीडिया इसके लिये एक महत्वपूर्ण माध्यम सिद्ध हो सकता है.

बहुमुखी प्रतिभा के धनी-डा. बिधान चंद राय

          आज सारे देश में  ' राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस   (National Doctors day)' मनाया जा रहा है. यह दिवस  देश के जाने-  माने चिकित्सक और पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री  भारतरत्न डॉ. बिधान चंद्र रॉय की स्मृति में मनाया जाता है।   भारत में केंद्र सरकार  ने1991 में  1  जुलाई को 'नेशनल डॉक्टर्स डे ' मनाने का निर्णय किया था. उसी समय से भारत में 1 जुलाई (उनके जन्मदिन) को 'राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस' के रूप में मनाया जाता है
        आज  डॉ॰ बिधान चंद्र राय का की जयंती एवं पुण्यतिथि दोनों है. वे एक प्रसिद्ध चिकित्सक,  स्वाधीनता सेनानी एवं समाजसेवी थे. 
         डा.  राय का जन्म  पटना (बिहार) जिले के बांकीपुर गांव में हुआ था। उनके पिता श्री प्रकाश चंद्र राय डिप्टी कलेक्टर के पद पर  थे। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की।1905 में जब बंगाल का विभाजन हो रहा था जब बिधान चंद्र रॉय कलकत्ता यूनिवर्सिटी में अध्ययन कर रहे थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े और बंगाल की राजनीति में सक्रिय हुये.। इस दौरान  वे  महात्मा गांधी जी के व्यक्तिगत  चिकित्सक रहे। वे 1922 में कलकत्ता 'मेडिकल जरनल'  के संपादक  एवं बोर्ड के सदस्य भी बने। 
         उन्होंने  आज़ादी के संघर्ष में भी सक्रिय भाग लिया. भारतीय स्वतंत्रता सेनानी तथा राष्ट्रीय कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता एवं गांधीवादी थे। उन्होंने 1926 को अपना पहला राजनीतिक भाषण दिया तथा 1928 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य चुने गए। उन्हें 'बंगाल का मसीहा' भी कहा जाता है। 
          डॉ॰ बिधान चंद्र राय ने भारत की आजादी के बाद अपना पूरा जीवन चिकित्सा सेवा को समर्पित कर दिया। वे 1948 से वे 14  वर्षों तक पश्चिम बंगाल के  मुख्यमंत्री के रूप में चौदह वर्षों तक उसी पद पर रहे। डॉ. रॉय ने बंगाल में कई संस्थानों और 5 शहरों की स्थापना की। इनमें दुर्गापुर, कल्यानी, अशोकनगर, बिधान नगर और हाबरा शामिल है।
          1933 में ‘आत्मशुद्धि’ उपवास के दौरान गांधी जी ने दवायें लेने से मना कर दिया था। डा.बिधान चंद्र राय बापू से मिले और उनसे दवायें लेने का आग्रह किया. गाँधी जी उनसे बोले," मैं तुम्हारी दवाएं क्यों लूं? क्या तुमने हमारे देश के 40 करोड़ लोगों का मुफ्त इलाज किया है?" इस पर डा. राय ने उतर दिया," नहीं बापू! मैं सभी मरीजों का मुफ्त इलाज नहीं कर सकता। मैं यहां मोहनदास करमचंद गांधी को ठीक करने नहीं आया हूं, मैं उन्हें ठीक करने आया हूं जो मेरे देश के 40 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि हैं।इस पर गांधी जी ने उनसे मजाक करते हुए कहा, तुम मुझसे थर्ड क्लास वकील की तरह बहस कर रहे हो।"
           डॉ. बिधान चंद्र रॉय देश के उन डॉक्टर्स में से एक थे जिनकी हर सलाह का पालन पंडित जवाहर लाल नेहरू भी पूरी सावधानी के साथ करते थे। इसकी चर्चा नेहरू जी ने ने 'वॉशिंगटन टाइम्स ' को 1962 में दिए एक इंटरव्यू में की थी. नेहरू जी के इलाज के लिए डॉक्टर्स का एक पैनल बनाया गया था, जिसमें रॉय शामिल थे। इंटरव्यू के बाद अखबार ने लिखा था - " डा. रॉय इतने  महत्वपूर्ण हैं कि नेहरू जी भी उनके प्रत्येक  मेडिकल निर्देश का पालन करते हैं."
           डॉ॰ बिधान चंद्र राय का 1 जुलाई 1962 को ह्रदयगति रुकने से निधन हो गया। सन् 1961 में उन्हें 'भारत रत्न' से सम्मनित किया गया। सन् 1967 में दिल्ली में उनके सम्मान में डॉ. बीसी राय स्मारक पुस्तकालय की स्थापना की भ‍ी गई। 
             ऐसे इतिहास पुरुष को विनम्र श्रद्धांजलि.
                           🙏🙏🙏
      ( from my blog 'Pearls of Thoughts' )

Sunday, June 28, 2020

भारत में आर्थिक सुधारों के पुरोधा - श्री पी. वी. नरसिंह राव

            भारत के दसवें प्रधान मंत्री एवं भारत में आर्थिक सुधारों के जनक श्री पी.वी. नरसिंह राव  की तक 99वीं  जयंती है. उनका जन्म 28 जून 1921 को आंध्र प्रदेश के करीमनगर में हुआ था. हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय, मुंबई विश्वविद्यालय एवं नागपुर विश्वविद्यालय में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की. वे एक उदभट् विद्वान एवं कई  भाषाओं के ज्ञाता थे.
श्भारतीय दर्शन एवं संस्कृति, कथा साहित्य एवं राजनीतिक टिप्पणी लिखने, भाषाएँ सीखने, तेलुगू एवं हिंदी में कविताएं लिखने एवं साहित्य में उनकी विशेष रुचि थी। 
             श्री नरसिंहराव का राजनीति का सफर बड़ा ही महत्व  पूर्ण रहा. वे आंध्र प्रदेश सरकार में 1962 से 64 तक कानून एवं सूचना मंत्री, 1964 से 67 तक कानून एवं विधि मंत्री, 1967 में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा मंत्री एवं 1968 से 1971 तक शिक्षा मंत्री रहे तथा 1971 से 73 तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे.
            1977 से 84 तक वे लोकसभा के सदस्य रहे और दिसंबर 1984 में रामटेक से आठवीं लोकसभा के लिए चुने गए।  उन्होंने  देश के विदेश मंत्री,   गृह मंत्री, रक्षा मंत्री एवं मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में कुशलतापूर्वक कार्य किया.
            विदेश मंत्री के अपने कार्यकाल में श्री राव ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के क्षेत्र में अपनी शैक्षिक पृष्ठभूमि एवं राजनीतिक तथा प्रशासनिक अनुभव का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया। उन्होंने जनवरी 1980 में नई दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन के तृतीय सम्मेलन की अध्यक्षता ,मार्च 1980 में न्यूयॉर्क में जी-77 की बैठक की भी अध्यक्षता की. फरवरी 1981 में गुट निरपेक्ष देशों के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में उनकी भूमिका अत्यंत प्रशंसनीय  थी। 
              वर्ष 1982 और 1983 भारत और इसकी विदेश नीति के लिए अति महत्त्वपूर्ण था। खाड़ी युद्ध के दौरान गुट निरपेक्ष आंदोलन का सातवाँ सम्मेलन भारत में हुआ जिसकी अध्यक्षता श्रीमती इंदिरा गांधी ने की। इसकी सफलता के मूल में श्री राव के अथक प्रयास थे. वे 'विशेष गुट निरपेक्ष मिशन' के भी नेता रहे जिसने फिलीस्तीनी मुक्ति आन्दोलन को सुलझाने के लिए नवंबर 1983 में पश्चिम एशियाई देशों का दौरा किया। विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने यू.एस .ए., यू.एस.एस.आर, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, वियतनाम, तंजानिया एवं गुयाना जैसे देशों के साथ हुए विभिन्न संयुक्त आयोगों की भारत की ओर से अध्यक्षता की
           जून, 1991 की बात है. कांग्रेस ने श्री राव के कांग्रेस अध्यक्ष रहते आम चुनाव में सबसे ज्यादा 244 सीटें जीती थीं.  श्री नरसिम्हा राव को कांग्रेस संसदीय दल के नेता चुना और उन्होंने कुशलता पूर्वक अगले पाँच वर्ष तक अल्पमतीय सरकार का नेतृत्व किया. उन्होंने दौ.मनमोहन सिंह वित्तमंत्री  बनाया जिनकी आर्थिक नीति से भारत में आर्थिक सुधारों एवं उदारीकरण का दौर शुरू हुआ.
           वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए अपने एक ट्वीट में नरसिम्हा राव को एक असाधारण विद्वान बताया और लिखा कि उन्होंने इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर देश को अपना नेतृत्व दिया."  पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू ने अपनी पुस्तक "1991- The year that changed India' में लिखा है, " श्री राव का भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अमूल्य योगदान रहा है और वे भारत रत्न के हकदार हैं."
              पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी से श्री राव के गहरे संबंध रहे. कई अवसरों पर विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने दल के संसद की कार्यवाही से बहिष्कार कर श्री राव की अल्पमतीय सरकार को बचाया था.  श्री राव ने भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर देश के  कई प्रतिनिधिमंडलों को श्री बाजपेयी के नेतृत्व में भेजा था. जब श्री बाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते परमाणु विस्फोट किया गया तो उसमें श्री राव के योगदान को भी  अटल जी ने स्वीकार किया था.
              आज भी श्री राव को सम्मान के साथ याद किया जा रहा है.  यहाँ तक कि उनकी पार्टी काग्रेस, जिसने एक समय ( निधन पर भी)  उनकी घोर उपेक्षा की थी, आज उनके योगदान की चर्चा कर रही है. अक्टूबर, 2014 में  उस समय एन. डी.  ए. की सरकार में शामिल दल तेलुगू देशम पार्टी (TDP) ने एक प्रस्ताव पारित कर सरकार से मांग की थी कि नई दिल्ली में पीवी नरसिम्हा राव का समाधि स्थल बनाया जाए. इसके बाद  राष्ट्रीय राजधानी में श्री राव के नाम पर भी एक स्मृतिस्थल बन गया है.
               श्री राव के जन्म स्थल वारंगल (तेलंगाना) और आंध्र प्रदेश में राव के प्रति काफी सम्मान और सहानुभूति है. तेलंगाना की टीआरएस सरकार ने तो स्कूली पाठ्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री की जीवनी भी शामिल की थी और  उन्हें भारत रत्न देने की मांग भी कर चुकी है.
               तेलंगाना की वर्तमान टी.आर. एस. ने श्री राव के जन्मशती वर्ष पर अनेक कार्यक्रमों की घोषणा की है.
               ऐसे बहुमुखी प्रतिभासंपन्न राजनेता को जन्मतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि.
                          🙏🙏🙏

Saturday, January 26, 2019

आइये! ' गणतंत्र' को समझें


                
         सारा देश आज 70वां ' गणतंत्र दिवस '  मना रहा है .हम 15 अगस्त को 'स्वतंत्रता दिवस' भी मनाते हैं .दोनों दिवसों  की  अलग -अलग  महत्ता है .
        ' स्वाधीनता ' विदेशी शासन के साथ लम्बे संघर्ष में हमारे अनगिनत वीरों की कुर्बानियों का परिणाम है  . 15 अगस्त को हमें विदेशी गुलामी से मुक्ति मिली. इसलिये इस दिन हम 'स्वतंत्रता दिवस' मनाते हैं ...
         जब किसी से यह पूछा जाता है कि हम गणतंत्र दिवस क्यूँ मनाते हैं ? तो प्राय: एक ही जबाब आता है कि आज के दिन हमारा संविधान लागू हुआ था ....अधिकतर कार्यक्रमों में वक्ताओं के भाषण  दोनों दिवसों पर एक जैसे होते हैं ....नेता व अधिकारी भी  इनके फर्क को बहुत कम  जानते  हैं.

        यह  सच हैं कि आज के दिन हमारा संविधान लागू हुआ था .पर इस संविधान ने हमारे देश एक 'गणतंत्र' घोषित किया था .अत:संविधान को जानने के लिये हमें ' गणतंत्र ' को जानना ज़रूरी है.

        विश्व इतिहास के अध्ययन से स्पष्ट होता है  कि अधिकतर देशों में पहले 'राजतंत्र' ही थे .समय के साथ  राजतंत्र का लोकतंत्रीकरण  सबसे पहले ब्रिटेन  में हुआ जहां सीमित राजतंत्र को अपनाया गया है .जबकि लोकतंत्र का घर ब्रिटेन को ही माना जाता है .
          'संयुक्त राज्य अमेरिका'  विश्व का  सबसे  पहला राज्य था जिसने स्वयं को 'गणतन्त्र' था .उसके बाद कई राज्यों  ने गणतंत्र घोषित किया . फ्रांस,भारत, चीन , रूस सभी गणतांत्रिक राज्य हैं.

          गणतंत्र (Republic) को परिभाषित करते हुए Encyclopedia of Britainica में बताया गया  है कि गणतंत्र वह लोकतांत्रिक प्रणाली है ज़िसकी दो प्रमुख विशेषतायें होती हैं -
          प्रथम , राज्य प्रधान जनता द्वारा निर्वाचित(  प्रत्यक्ष  या अप्रत्यक्ष ) होता है ,
          द्वितीय , राज्य प्रधान वंशानुगत नहीं  होता .

           हमारे देश में भी गणतांत्रिक संविधान अंगीकृत किया गया है इसका अर्थ है कि भारत के प्रत्येक नागरिक को यह अवसर प्राप्त है कि वह  अपनी योग्यता व क्षमता के आधार पर बिना किसी भेदभाव राज्य के सर्वोच्च पद( राज्य प्रधान) पर पहुँच सके .
           हमारे देश में विभिन्न दलित व पिछड़े वर्गों के व्यक्ति भी राष्ट्रपति के रूप में  राज्य प्रधान के सर्वोच्च पद पर पहुचे हैं जैसे - आर  के  नारायणन ( दलित S C ). ग्यानी जैल सिंह (  बढ़ई ).कलाम साहब (मछुआरा  परिवार )और वर्तमान में कोविंद जी.यह गणतंत्र में  ही संभव है .
           ब्रिटेन ,जापान,स्पेन ,आस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे राज्य लोकतांत्रिक  जरूर हैं पर इन देशों में राज्य प्रधान वंशानुगत   होता है .अत: ये राज्य सीमित राजतंत्र की श्रेणी में आते हैं.

             26 जनवरी 1950 के दिन संविधानसभा ने हमारे देश के लिये एक ऐसे गणतान्त्रिक संविधान को अंगीकृत  किया था जो संप्रभु, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष,लोकतांत्रिक  व गणतंत्र  के निर्माण का वचन देता है ज़िसमें सभी को स्वतंत्रता ,समानता व न्याय की सुरक्षा मिले .,सभी भाईचारे के साथ रहें .भारतीय संविधान की प्रस्तावना उक्त बातो को उदघोषित्   करती  है .
             इसी कारण  हम 'गणतंत्र दिवस' मनाते हैं

Thursday, November 1, 2018

पटेल एवं नेहरू


      सरदार वल्लभ भाई पटेल और पं जवाहर लाल नेहरू के संबंधों पर कुछ लोग  हमेशा से भ्रमपूर्ण टिप्पणियाँ करते  रहे हैं. जो कि निम्नांकित हैं. इनमें सत्यता बहुत कम है -

1. सरदार पटेल को पं नेहरू ने प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया.
        स्वतंत्रता के समय सरदार पटेल की आयु 72 वर्ष हो चुकी थी और उन्हें एक बार दिल का दौरा पड़ चुका था. महात्मा गांधी सरदार पटेल की बीमारी और उनकी शारीरिक क्षमता को जानते थे अतः उन्होंने 58 वर्षीय पं नेहरू को भारत का पहला प्रधानमंत्री बनाया जिस पर पटेल ने भी सहमति व्यक्त दी. संगठन में पटेल की पूरी पकड़ थी.  उन्होने गृह मंत्री व उपप्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के नेतृत्व में पूरी निष्ठा से कार्य किया.
          महात्मा गांधी की दूरदृष्टि सही सिद्ध हुई और जनवरी 1948 में नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या के सदमे को सहन  न कर पाने के कारण मार्च 1948 के पहले हफ्ते में ही सरदार पटेल को दिल का दूसरा दौरा पड़ा.उस समय आज जैसी सुविधाएं देश में मौजूद नहीं थी. सरदार पटेल के होश में आने तक पं नेहरू लगातार उनके पास बैठे उनका सर सहलाते रहे और रो रहे थे. स्वतंत्रता प्राप्ति  के  3 वर्षों के अंदर ही 1950 में लंबी बीमारी के बाद सरदार पटेल का देहावसान हो गया.

2. सरदार पटेल को पं नेहरू और कांग्रेस ने सम्मान नहीं दिया.
        यह ऐसा झूठ है जो लोगों में भ्रम फैला रहा है.इस संबंध में निम्नांकित तथ्य द्रष्टव्य हैं .

(अ ) सरदार पटेल की स्मृति में पं नेहरू और कॉन्ग्रेस की सरकार ने करोड़ों रुपये  खर्च करके गुजरात में सरदार सरोवर बांध का निर्माण कराया, जिससे मध्यप्रदेश और गुजरात के लाखों किसानों को पानी उपलब्ध हुआ और दोनों प्रदेशों का सिंचित क्षेत्र 25% बढ़ गया.  यह किसानों के नेता सरदार पटेल को पं.नेहरू द्वारा दी गई सबसे बड़ी श्रद्धांजलि थी.

(ब )सरदार पटेल देश के पहले गृह मंत्री थे और उनके नाम पर देश में आईपीएस अफसरों की ट्रेनिंग करने वाली संस्था को सरदार पटेल का नाम देकर पं नेहरू ने सरदार पटेल को स्मृति शेष रखा.

(स) अहमदाबाद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम सरदार पटेल के नाम पर रखकर कांग्रेस ने सरदार पटेल को एक और श्रद्धांजलि दी.

( द) सरदार पटेल को देश के इतिहास में उचित सम्मान देते हुए पं नेहरू सरदार पटेल के परिवार को भी नहीं भूले थे.सरदार पटेल के पुत्र और पुत्री दोनों को पं नेहरू ने तीन-तीन बार सांसद बनाया.
       आज देश में कोई बड़ा शहर ऐसा नहीं होगा जहां पर सड़क, चौराहे, अस्पताल, स्कूल, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, सरदार पटेल के नाम पर न हो.
       सरदार पटेल और पंडित नेहरू के संबंधों के बारे में बात करते हुए हम अक्सर यह भूल जाते हैं सरदार पटेल और पंडित नेहरू की उम्र में 14 वर्ष का अंतर था.  .......महात्मा गांधी, सरदार पटेल, मदन मोहन मालवीय और मोतीलाल नेहरू  आदि हम उम्र और मित्र थे, ये कांग्रेस की एक पीढ़ी के नेता थे.
        दूसरी पीढ़ी में पंडित नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, जयप्रकाश नारायण आदि आते थे  जो उम्र में काफी कम थे और युवा थे.
       मोतीलाल नेहरू का समकालीन  होने के कारण सरदार पटेल , महात्मा गांधी,  मदन मोहन मालवीय आदि पंडित नेहरू के लिए पितृ तुल्य रहे.
        जब हैदराबाद के बदले में सरदार पटेल पाकिस्तान को कश्मीर देने पर तैयार हो गए थे तब पंडित नेहरू ने पूरी नम्रता से सरदार पटेल को मनाया कि ऐसा करना देश हित में नहीं होगा और सरदार पटेल ने अपना पूरा स्नेह पंडित नेहरू पर लुटाते हुए पंडित नेहरू की बात मान ली.
        जब महात्मा गांधी की हत्या के बाद सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगा दी थी तब पुनः पं नेहरू का अनुरोध मानकर सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर से सशर्त वह पाबंदी हटाई.
        सरदार पटेल और पं नेहरू की  तुलना का कोई औचित्य नहीं है और यह तुलना की भी नहीं जानी चाहिए .
        स्वतंत्रता के बाद रियासतों  के देश में  एकीकरण में सरदार पटेल की योगकारी भूमिका रही  पर  स्वतंत्र भारत के पुनर्निर्माण में जहाँ सरदार  पटेल ने अपने जीवन के मात्र 3 वर्ष ही दे सके  वहीं पंडित नेहरू को  अपने जीवन के 17 वर्ष देने का अवसर मिला .  इसलिये  पंडित नेहरू को आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है .
       पिछले कुछ वर्षों में देश में एक बात अच्छी हुई है कि वर्तमान सरकार व आर.  एस. एस. के नेताओं ने कांग्रेस से जुड़े महापुरुषों और स्वतंत्रता सेनानियों जैसे सरदार पटेल, महात्मा गांधी,  नेताजी सुभाष चंद्र बोस और क्रांतिकारियों  जैसे -चंद्र शेखर आजाद, सरदार भगत सिंह आदि को सम्मान देना शुरू कर दिया है,  और देश की स्वतंत्रता में उनके योगदान को रेखांकित करना शुरू किया है.
        आज निष्पक्ष होकर हमारे देश की स्वतंत्रता व निर्माण में योगदान देने वाले  मनीषियों की भूमिका को जानने व समझने की जरूरत है ....न कि उन्हें  प्रदेश,  जाति व सीमित राजनीतिक हितों  की पूर्ति के  उद्देश्य से बॉट कर देखने की.

Wednesday, October 31, 2018

लौह पुरुष एवं लौह महिला को नमन


        आज 31 अक्टूबर   भारतीय  इतिहास  में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने  के लिये प्रसिद्ध दो हुतात्माओं के स्मरण का दिवस है जो लौह पुरुष  और लौह महिला के खून में जाने जाते हैं.
        आज देश के पहले उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री  सरदार बल्लभ भाई पटेल  का जन्मदिवस है जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद देशी रियासतों के भारत में विलय की प्रक्रिया  को कुशलता से  संपादित किया. वे भारतीय अखंडता  के अग्रदूत कहलाये जाते  हैं.
        आज देश की पहली महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गंधी का  बलिदान दिवस भी है . इंदिरा जी की सफल विदेशनीति व कूटनीतिक कौशल के कारण ही  1971 में  अमेरिका के तत्कालीन दत्तक पुत्र पाकिस्तान  का विभाजन हुआ,  उसे मुँह की खानी पड़ी.   अमेरिका की अंतराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी किरकिरी हुई  और वहॉ के  तत्कालीन  राष्ट्रपति निक्सन को स्वीकार करना पड़ा कि भारत अब एक महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है......  राष्ट्र की अखंडता बनाये रखने के लिये उनके समय में पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद के विरुद्ध ' आपरेशन ब्लू स्टार ' हुआ. आतंकवाद  के विरूद्ध होने के कारण  आज के दिन उनकी हत्या कर दी गयी.
         आइये!  ओछी ऱाजनीति को दरकिनार कर  आज  इन हुतात्माओं का स्मरण करें  व उन्हें श्रद्धांजलि दें.

Sunday, July 15, 2018

उत्तर प्रदेश में लेखपालों की हड़ताल

    लोकतंत्र में धरना प्रदर्शन, कार्य -बहिष्कार और जेल भरो आंदोलन सत्याग्रह आदि अधिकार एवं न्याय मांगने के माध्यम होते हैं। आजादी के समय महात्मा गांधी जी ने सत्याग्रह का तरीका अपनाया था जिसके सामने शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार बेबस हो गयी थी.
    स्वतंत्रता के बाद भी अपनी मॉगों को मनवाने के लिये शांतिपूर्ण धरना, प्रदर्शन व आंदोलन के तरीके विभिन्न कर्मचारी संगठनों के द्वारा अपनाये जाते रहे हैं. प्राय:यह देखा गया है कि आंदोलन के दौरान आंदोलनकारी पुलिस की लाठी गोली खाने के बावजूद हिंसक नहीं होते हैं
      यह भी देखा गया है कि आंदोलन, विरोध एवं कार्य बहिष्कार व हड़ताल के सहारे जितनी सफलता कर्मचारी संगठनों को मिल जाती है, उतनी आमलोगों को धरना प्रदर्शन करने पर जल्दी नही मिल पाती है। कहा जाता है -" संघे शक्ति कलियुगे" (कलियुग में सगंठन की शक्ति है) लोकतंत्र में संगठित होकर संघर्ष करने से प्राय: सफलता प्राप्त हो जाती है।
     उत्तर प्रदेश में इस समय लेखपालों की हड़ताल चर्चा का विषय बनी हुयी है और सरकार ने इस हड़ताल पर रोक लगा दी है। इतना ही नहीं हड़ताली लेखपालों के खिलाफ एस्मा कानून के तहत मुकदमें दर्ज कराये जा रहे हैं और लेखपालों को बर्खास्त तक करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।.     
     लेखपाल पिछले कई दिनों से अपनी कुछ मांगों को लेकर सांकेतिक हड़ताल चला रहे थे लेकिन इधर उन्होंने हड़ताल के स्वरूप को  उग्र कर दिया और सारा कामकाज बंद करके बेमियादी हड़ताल शुरू कर दी गई है।
      यह देखा जा रहा है कि इस हड़ताल का प्रभाव सरकार पर कम ,आमजनता पर अधिक पड़ रहा है और सबसे ज्यादा असुविधा राजस्व मामलों में हो रही है। लोगों को जाति निवास एवं आय प्रमाण पत्र नही मिल पा रहे हैं।
      सरकार भी जिद पर अड़ गयी है और उसने स्पष्ट कर दिया है कि पहले हड़ताल खत्म हो फिर आगे की बात हो .उसने कठोर कार्यवाही के संकेत भी दे दिये हैं.
      वैसे लोकतंत्र में आंदोलन व हड़ताल को राष्ट्रहित में दबाया जा सकता है किन्तु जहॉ पर अधिकारों एवं हक की लड़ाई हो वहां पर आंदोलनकारियों की बात सुनकर उनकी उचित मांगों पर विचार करना भी सरकार का ही दायित्व होता है।
     लेखपालों की माँगें अगर उचित हैं तो सरकार का दायित्व बनता है कि वह उन पर ध्यान दे ,क्योंकि सरकार जनता के साथ अपने कर्मचारियों की भी संरछक होती है. लेकिन लेखपालों का भी दायित्व है कि वे संगठन व आंदोलन को हथियार न समझ कर अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों का भी ध्यान रखें .
      लेखपाल सीधे आमलोगों से जुड़ा राजस्व का प्रथम लोकसेवक होता है और उसकी पैमाइश एवं जाँच रिपोर्ट आदि पर अदालत सिर्फ बहस सुनती है।लेखपाल जनजीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पद होता है जिसकी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है तथा वह ग्राम पंचायत में प्रधान के सचिव की भूमिका निभाता है। लेखपालों की मॉगें कितनी जायज क्यों न हो ,उनकी हड़ताल से सबसेे अधिक असुविधा आम लोगों को ही हो रही है.
     योगी सरकार ने इस हड़ताल पर सख्त रुख अख्तियार किया है. इससे लेखपालों में हड़कंप मच गया है. प्राय: यह देखा गया है कि जब चुनाव पास आते हैं तो विभिन्न संगठन अपनी मॉगों को पूरा करने का दबाव बनाने लगते हैं. इस संबंध में सरकार को एक संतुलित नीति अपनानी चाहिये. लोकतंत्र में सरकार शक्ति या दमन के जोर पर नहीं चल सकती. पर लोगों को जो अधिकार मिले हैं उनसे दुरुपयोग व ब्लैकमेल करने की भी छूट नहीं दी  जा सकती है. शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना ही एकमात्र विकल्प है.