" आज राम ने जीती लंका , और बजाया विजय का डंका ;
हुई पराजित आज बुराई , फिर से जीत गयी अच्छाई ;
काश ! देश में ऐसा होवे , अच्छाई का मान न खोवे ;
हारें सारे गलत इरादे , पूरे हों जन-जन से वादे ;
शासकगण हों उत्तरदायी , बने माहौल जन - सुखदायी ;
हो साकार ऐसा सपना ,.यही दशहरा पर शुभकामना ."
Sunday, October 17, 2010
Saturday, October 2, 2010
गाँधी जी का डंडा
जेब में हैं गाँधी जी .
गाँधी जयंती पर आज हमारे शहर में एक कार्यक्रम गांधीजी के दुर्लभ चित्रों की प्रदर्शनी के रूप में हुआ । प्रदर्शनी नगर के एक संग्रहालय ने लगाई थी जो कि आयोजकों के समर्पण और कड़ी मेहनत का परिणाम थी । इसका उदघाटन प्रदेश सरकार के एक मंत्री ने किया। मंत्री जी कभी आर० एस ० एस ० के कार्यकर्ता रहे थे , अब बसपा के ब्राहमण कार्ड के बदौलत बसपा सरकार में मंत्री हैं । आर ० एस ० एस ० और बसपा दोनों के गाँधी जी के कितने प्रखर आलोचक रहे हैं ,यह सभी को पता है । कार्यक्रम के इस विरोधाभासी पक्ष पर कितने लोगों का ध्यान गया यह पता नहीं पर जब मुख्य अतिथि प्रदर्शनी का अवलोकन कर रहे थे उस समय आयोजन करने वाली संस्था के एक कार्यकर्त्ता ने मंत्री को समझाया कि गाँधी जी हमारे देश में इतने लोकप्रिय हैं कि हमारी जेब में रहते हैं। शायद उनका आशय नोटों पर छपे गाँधी जीके चित्र से था। यह सुन कर प्रदर्शनी देख रहे एक दर्शक ने टिप्पणी कि हमारा दुर्भाग्य है कि हमने गांधीजी को जेब में बंद कर रखा है ,आवश्यकता उन्हें जेब से निकल कर उनके कृतित्व से कुछ सीखने की है ।
Tuesday, September 14, 2010
हिंदी दिवस -रस्म अदायगी
हम 'हिंदी दिवस' बस मनाते रहेंगे ,
व्यथा हिंदी की सबको सुनाते रहेंगे।
दिवस हम मनाते यह अहसान कम है,
है यह राजभाषा ,हमें अब क्या गम है?
आज हिंदी की गाथा सुनाने का दिन है,
या हिंदी पर मातम मनाने का दिन है?
दुर्दशा हिंदी की हम बताते रहेंगे,
पर भाषा का गौरव भुलाते रहेंगे।
बनी आज हिंदी है अनुवाद -भाषा
करें इससे कैसे प्रगति की हम आशा ?
रहेगी गर इसमें शाब्दिक कठिनता,
सहज रूप में कैसे अपनाए जनता ?
होगी लोकप्रिय यह जब होगी सहजता,
करें इसको विकसित कि आये सरलता।
तब हिंदी लगेगी जन -जन की भाषा .
तभी दूर होगी छायी निराशा।
अन्यथा,गोष्ठियाँ -सेमिनार कराते रहेगे ,
और दिवस यूँ ही हरदम मनाते रहेंगे ।
हिंदी का विकास -एक व्यापक दृष्टिकोण की अपनाने की जरूरत
प्रति वर्ष की तरह हिंदी दिवस मनाने की औपचारिकता आज हिंदी दिवस पर पूरी की गयी । हिंदी की याद बुद्धिजीवियों ,साहित्यकारों को आज के दिन ही आती है । हिंदी की दुर्दशा एवं स्थिति पर आँसू बहाए जाते हैं । सरकार को कोसा जाता है और दूसरे दिन हिंदी को कोई नहीं याद करता ।
भाषा का सम्बन्ध किसी राष्ट्र की अस्मिता से होता है । एक राष्ट्र के लोगों के लिये उनकी भाषा पर गर्व होता है । अपनी भाषा के विकास उन्नयन के लिये प्रयास करना शासन एवं नागरिकों का कर्तव्य है । पर हमारा देश आज तक अपनी भाषा के लिये सर्वसम्मति नहीं बना पाया । इसके लिये सरकार ,राजनीतिक दल ,वोट पालिटिक्स तो जिम्मेवार है ही , हिंदी के उदभट विद्वान् कम उत्तरदायी नहीं है जिन्होंने हिंदी को सेमिनारों एवं गोष्ठियों तक सीमित कर लिया है । संस्कृतनिष्ठ क्लिष्ट हिंदी आम आदमी से दूर होती जा रही है ।
किसी भी भाषा का विकास उसमे लोगों की सक्रिय सहभागिता से होता है । भाषा संवाद एवं सम्प्रेषण का एक माध्यम है । यदि इसमें सहजता व सरलता का अभाव रहता है तो आम आदमी इससे दूर हो जायेगा। भारत जैसे विकासशील देश में जहाँ आज भी साक्षरता का प्रतिशत बहुत कम है ,भाषा को ग्राह्य बनाने के लिये जमीनी सच्चाई को समझना होगा। हिंदी को लोगो की भाषा बनाने के लिये इसे क्लिष्टता के चंगुल से तो दूर करना ही होगा अपितु अन्य भाषा विशेषकर अंग्रेजी के लोकग्राह्य शब्दों को अपनाना होगा ,बिना यह चिंता किये कि इससे भाषा का शास्त्रीय स्वरूप प्रभावित होगा ।
विश्व की कोई भी ऎसी भाषा नहीं है जिसमे अन्य भाषाओँ के शब्दों को ग्रहण न किया हो । अंग्रेजी भाषा में ही दस लाख से अधिक शब्द अन्य भाषाओँ के हैं ,पर इससे उसके अस्तित्व पर कोई संकट नहीं आया । हिंदी के विकास और विस्तार के लिये हमें यह व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा।
आज का युग वैश्वीकरण का युग है। भारत विश्व के विकसित देशों की नजर में एक बड़ा बाजार है । बड़े देशो ने अपने तकनीकी विशेषज्ञों को हिंदी सिखाने की शुरूआत कर दी है जिससे वे यहाँ की भाषा में आम लोगों से संवाद कर अपने उत्पादों को जन -जन तक पहुंचा सकें । जाहिर है ऐसी भाषा संस्कृतनिष्ठ हिंदी नहीं वरन आम लोगों की सहज संवाद की भाषा ही हो सकती है । इससे हिंदी रोटी -रोजी से जुड़ सकती है । ऐसा हो भी रहा है । आर्थिक कारण किसी भी सामाजिक , राजनीतिक परिवर्तन में निर्णायक होते हैं , भाषा का विकास और विस्तार इससे अछूता कैसे रह सकता है ?हिंदी भी इसका अपवाद कैसे हो सकती है ?
भाषा का सम्बन्ध किसी राष्ट्र की अस्मिता से होता है । एक राष्ट्र के लोगों के लिये उनकी भाषा पर गर्व होता है । अपनी भाषा के विकास उन्नयन के लिये प्रयास करना शासन एवं नागरिकों का कर्तव्य है । पर हमारा देश आज तक अपनी भाषा के लिये सर्वसम्मति नहीं बना पाया । इसके लिये सरकार ,राजनीतिक दल ,वोट पालिटिक्स तो जिम्मेवार है ही , हिंदी के उदभट विद्वान् कम उत्तरदायी नहीं है जिन्होंने हिंदी को सेमिनारों एवं गोष्ठियों तक सीमित कर लिया है । संस्कृतनिष्ठ क्लिष्ट हिंदी आम आदमी से दूर होती जा रही है ।
किसी भी भाषा का विकास उसमे लोगों की सक्रिय सहभागिता से होता है । भाषा संवाद एवं सम्प्रेषण का एक माध्यम है । यदि इसमें सहजता व सरलता का अभाव रहता है तो आम आदमी इससे दूर हो जायेगा। भारत जैसे विकासशील देश में जहाँ आज भी साक्षरता का प्रतिशत बहुत कम है ,भाषा को ग्राह्य बनाने के लिये जमीनी सच्चाई को समझना होगा। हिंदी को लोगो की भाषा बनाने के लिये इसे क्लिष्टता के चंगुल से तो दूर करना ही होगा अपितु अन्य भाषा विशेषकर अंग्रेजी के लोकग्राह्य शब्दों को अपनाना होगा ,बिना यह चिंता किये कि इससे भाषा का शास्त्रीय स्वरूप प्रभावित होगा ।
विश्व की कोई भी ऎसी भाषा नहीं है जिसमे अन्य भाषाओँ के शब्दों को ग्रहण न किया हो । अंग्रेजी भाषा में ही दस लाख से अधिक शब्द अन्य भाषाओँ के हैं ,पर इससे उसके अस्तित्व पर कोई संकट नहीं आया । हिंदी के विकास और विस्तार के लिये हमें यह व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा।
आज का युग वैश्वीकरण का युग है। भारत विश्व के विकसित देशों की नजर में एक बड़ा बाजार है । बड़े देशो ने अपने तकनीकी विशेषज्ञों को हिंदी सिखाने की शुरूआत कर दी है जिससे वे यहाँ की भाषा में आम लोगों से संवाद कर अपने उत्पादों को जन -जन तक पहुंचा सकें । जाहिर है ऐसी भाषा संस्कृतनिष्ठ हिंदी नहीं वरन आम लोगों की सहज संवाद की भाषा ही हो सकती है । इससे हिंदी रोटी -रोजी से जुड़ सकती है । ऐसा हो भी रहा है । आर्थिक कारण किसी भी सामाजिक , राजनीतिक परिवर्तन में निर्णायक होते हैं , भाषा का विकास और विस्तार इससे अछूता कैसे रह सकता है ?हिंदी भी इसका अपवाद कैसे हो सकती है ?
Wednesday, August 25, 2010
को न वशं याति लोके मुखे पिण्डेन पूरितं.
आखिर सांसदों की सेलरी को लेकर संसद में हुआ हंगामा थम ही गया । हमारे जनप्रतिनिधियों को यकायक आभास हुआ कि प्रोटोकोल में उनका ओहदा ज्यादा ऊँचा है , ब्यूरोक्रेट्स का कम । सो वे फ़ैल गये संसद में । हंगामा करने का तो उन्हें जन्मसिद्ध न सही ,कर्मसिद्ध अधिकार तो है ही । उनकी माँग थी की सांसदों की सेलरी सेक्रेटरी की सेलरी से ,एक रुपये ही सही ,अधिक होनी चाहिए।( सांसदों को जो भत्ते या अन्य सुविधाएँ मिलती है वह तो उनका विशेषाधिकार है ।)बहुत मनाया उन्हें हमारे मनमोहन जी व उनके संकटमोचक प्रणव दा ने । पर "नहीं माने , तो नहीं माने मचल गये सांसद गण "।
विपक्षी सांसद हंगामे की फ्रंट लाइन में थे । सत्ता पक्ष के सांसद भी मन ही मन उनके इस अभियान में दिल से साथ थे। अपने लालूजी फिल्म में भी काम कर चुके हैं, सो उन्होंने संसद की बैठक स्थगित होने के बाद ठेठ फ़िल्मी अंदाज में संसद भवन में ही नौटंकी कर डाली । अपने आप को प्रधानमंत्री घोषित कर दिया , भाजपा के मुंडे को स्पीकर और सपा के मुलायम सिंह को' नौटंकी गठबंधन' संयोजक । फटाफट कई प्रस्ताव भी पास किये गये जिसमें मनमोहन सरकार को बर्खास्त करने का प्रस्ताव भी था । विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के सांसदों यह नौटंकी सारी दुनिया ने देखी ।
इस मुद्दे पर दल, जाति,अगड़े -पिछड़े , दलित व सवर्ण का भेद भुला कर हमारे जनप्रतिनिधियों में जो एकता देखी गयी वह बेमिसाल थी। इसका यदि दशांश भी यदि इनके आचरण में ईमानदारी से दिखने लगे तो देश व समाज का काया-कल्प हो जाये। पर वे ऐसा क्यों करना चाहेंगे?
राजनीति के मंतर ही अलग होते हैं जिन्हें आम आदमी समझ ही नहीं पाता । संसद व मीडिया के सामने ये जन -प्रतिनिधि आतंकवाद का विरोध करेंगे ,पर परोक्ष में आतंकवादी गुटों पर हाथ फेरेगें व उनकी रैलियों में शिरकत करेंगें । संसद में मंहगाई पर चिल्लायेंगे व जनता के हितैषी बनने का स्वाँग रचेगें ,पर यह सारा नाटक जनता को दिखाने के लिये होता है.व्यवहार में इनकी संवेदनशीलता नगण्य होती है ।
सुप्रीमकोर्ट यदि निर्देश देता है की अनाज यदि सड़ रहा है तो इससे अच्छा है की गरीबों को बाँट दो । पर मंत्री कहता है कि अनाज सड़ भले ही जय पर उसे गरीबों को मुफ्त में नहीं बाँटा जायेगा। शकर के महँगे होने पर मंत्री जी फरमाते हैं कि मँहगी शकर होने पर लोग उसका सेवन कम करेंगें इससे मधुमेह कम होगा । ऐसी बातें हमारे लोकतंत्र का हिस्सा बन गयी हैं और ऐसे बयानों पर सरकार के नुमाइंदों को शर्म भी नहीं आती ।
संसदीय लोकतंत्र में ,विशेषकर गठबंधन संस्कृति में ,सत्ता संतुलन बनाये रखने एवं सरकार बचाने के लिये ऐसे ईडियट्स को भी मंत्री बनाये रखना प्रधानमंत्री की मजबूरी को समझ पाना कठिन नहीं है ।
सरकार भी सांसदों को लुभाने का मंतर जानती है । आखिर उसे परमाणु समझौते से सम्बंधित दायित्व विधेयक भी पारित कराना है । अतः सरकार ने भी कुछ टुकड़े सांसदों की सेलरी में और नत्थी कर दिये । संस्कृत में कहा गया है -' को न वशं याति लोके मुखे पिण्डेन पूरितं ' (अर्थात इस संसार में ऐसा कौन है जो मुख भर दिये जाने पर वश में नहीं हो जाता ।) फिर ये तो बेचारे लालची जन -प्रतिनिधि हैं । सरकार चलानी है तो सांसदों का निरंतर फैलता जा रहा पेट भरना सरकार की मजबूरी है । जनता को तो कष्ट सहने की आदत है , चाहे बाढ़ हो या सूखा ,बंद व हड़ताल हो या आतंकवाद व जिहाद। ये सारे दंश झेलना जनता की हमारे लोकतान्त्रिक देश में नियति बन गयी है।
विपक्षी सांसद हंगामे की फ्रंट लाइन में थे । सत्ता पक्ष के सांसद भी मन ही मन उनके इस अभियान में दिल से साथ थे। अपने लालूजी फिल्म में भी काम कर चुके हैं, सो उन्होंने संसद की बैठक स्थगित होने के बाद ठेठ फ़िल्मी अंदाज में संसद भवन में ही नौटंकी कर डाली । अपने आप को प्रधानमंत्री घोषित कर दिया , भाजपा के मुंडे को स्पीकर और सपा के मुलायम सिंह को' नौटंकी गठबंधन' संयोजक । फटाफट कई प्रस्ताव भी पास किये गये जिसमें मनमोहन सरकार को बर्खास्त करने का प्रस्ताव भी था । विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के सांसदों यह नौटंकी सारी दुनिया ने देखी ।
इस मुद्दे पर दल, जाति,अगड़े -पिछड़े , दलित व सवर्ण का भेद भुला कर हमारे जनप्रतिनिधियों में जो एकता देखी गयी वह बेमिसाल थी। इसका यदि दशांश भी यदि इनके आचरण में ईमानदारी से दिखने लगे तो देश व समाज का काया-कल्प हो जाये। पर वे ऐसा क्यों करना चाहेंगे?
राजनीति के मंतर ही अलग होते हैं जिन्हें आम आदमी समझ ही नहीं पाता । संसद व मीडिया के सामने ये जन -प्रतिनिधि आतंकवाद का विरोध करेंगे ,पर परोक्ष में आतंकवादी गुटों पर हाथ फेरेगें व उनकी रैलियों में शिरकत करेंगें । संसद में मंहगाई पर चिल्लायेंगे व जनता के हितैषी बनने का स्वाँग रचेगें ,पर यह सारा नाटक जनता को दिखाने के लिये होता है.व्यवहार में इनकी संवेदनशीलता नगण्य होती है ।
सुप्रीमकोर्ट यदि निर्देश देता है की अनाज यदि सड़ रहा है तो इससे अच्छा है की गरीबों को बाँट दो । पर मंत्री कहता है कि अनाज सड़ भले ही जय पर उसे गरीबों को मुफ्त में नहीं बाँटा जायेगा। शकर के महँगे होने पर मंत्री जी फरमाते हैं कि मँहगी शकर होने पर लोग उसका सेवन कम करेंगें इससे मधुमेह कम होगा । ऐसी बातें हमारे लोकतंत्र का हिस्सा बन गयी हैं और ऐसे बयानों पर सरकार के नुमाइंदों को शर्म भी नहीं आती ।
संसदीय लोकतंत्र में ,विशेषकर गठबंधन संस्कृति में ,सत्ता संतुलन बनाये रखने एवं सरकार बचाने के लिये ऐसे ईडियट्स को भी मंत्री बनाये रखना प्रधानमंत्री की मजबूरी को समझ पाना कठिन नहीं है ।
सरकार भी सांसदों को लुभाने का मंतर जानती है । आखिर उसे परमाणु समझौते से सम्बंधित दायित्व विधेयक भी पारित कराना है । अतः सरकार ने भी कुछ टुकड़े सांसदों की सेलरी में और नत्थी कर दिये । संस्कृत में कहा गया है -' को न वशं याति लोके मुखे पिण्डेन पूरितं ' (अर्थात इस संसार में ऐसा कौन है जो मुख भर दिये जाने पर वश में नहीं हो जाता ।) फिर ये तो बेचारे लालची जन -प्रतिनिधि हैं । सरकार चलानी है तो सांसदों का निरंतर फैलता जा रहा पेट भरना सरकार की मजबूरी है । जनता को तो कष्ट सहने की आदत है , चाहे बाढ़ हो या सूखा ,बंद व हड़ताल हो या आतंकवाद व जिहाद। ये सारे दंश झेलना जनता की हमारे लोकतान्त्रिक देश में नियति बन गयी है।
Sunday, August 15, 2010
हैप्पी इंडिपेंडेंस डे ?
हो रहा क्या आज अपने देश में ,
द्वेष , नफरत व्याप्त है परिवेश में;
खो रहीं अस्तित्व अपना मान्यतायें,
चल रहीं सर्वत्र अवसरवादी हवायें ;
त्रस्त है मंहगाई से सम्पूर्ण जनता ,
आज बेमानी लगे 'स्वाधीनता';
बैठा है हर कुर्सी पर छल ,
सब सुविधायें रहा निगल ;
ठगा - ठगा सा दिखे गरीब,
कैसा यह जनतंत्र और उसका नसीब ?
स्पीचें संसद में धाँसू ,
पोंछ न पायें गरीब के आँसू ;
जाति , धर्म में बँटता देश ,
आम जनों के बढ़ते क्लेश ;
नक्सल , माओ , सब आतंक ,
जनता झेले इनके डंक ;
कोई न देखे इनके छाले ,
उदर - भरण के इनको लाले ;
मुश्किल लगता अब जीना रे ,
कैसे मने 'स्वतंत्रता दिवस ' रे । "
द्वेष , नफरत व्याप्त है परिवेश में;
खो रहीं अस्तित्व अपना मान्यतायें,
चल रहीं सर्वत्र अवसरवादी हवायें ;
त्रस्त है मंहगाई से सम्पूर्ण जनता ,
आज बेमानी लगे 'स्वाधीनता';
बैठा है हर कुर्सी पर छल ,
सब सुविधायें रहा निगल ;
ठगा - ठगा सा दिखे गरीब,
कैसा यह जनतंत्र और उसका नसीब ?
स्पीचें संसद में धाँसू ,
पोंछ न पायें गरीब के आँसू ;
जाति , धर्म में बँटता देश ,
आम जनों के बढ़ते क्लेश ;
नक्सल , माओ , सब आतंक ,
जनता झेले इनके डंक ;
कोई न देखे इनके छाले ,
उदर - भरण के इनको लाले ;
मुश्किल लगता अब जीना रे ,
कैसे मने 'स्वतंत्रता दिवस ' रे । "
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