Monday, July 20, 2020

दुर्दांत अपराधियों के एनकाउंटर कितने उचित?

            उत्तर प्रदेश में आठ पुलिस वालों की नृशंस हत्या करने वाला दुर्दांत अपराधी विकास दुबे आखिर मध्य प्रदेश के उज्जैन में पकड़ा गया और उसका उत्तर प्रदेश ले जाते समय कानपुर पहुँचने से पहले ही पुलिस ने एनकाउंटर कर दिया. कहा गया कि उसने पुलिस की गाड़ी पलटने के बाद पुलिस वालों के हथियार छीन कर भागने की कोशिश की थी .  जिस ढंग से उसे मारा गया इसकी संभावना मीडिया पर पहले से व्यक्त की जा रही थी.
           कुछ समय पूर्व हैदराबाद में युवा महिला डाक्टर   से रेप व उसके हत्यारों का जब इसी प्रकार एनकाउंटर हुआ, उस समय जनता में बलात्कारियों और हत्यारों के विरुद्ध और हैदराबाद पुलिस के पक्ष में जो समर्थन और प्रशंसा का वातावरण बना  था, शायद उसी से प्रेरित होकर  उत्तर प्रदेश एसटीएफ द्वारा इस दुर्दांत अपराधी विकास दुबे और उसके कुछ साथियों का एनकाउंटर किया गया.
             समाज के एक वर्ग द्वारा इस ' जंगल के न्याय' के प्रति समर्थन दिया गया है जो कानून और न्याय की दृष्टि से काफी खतरनाक है. हमारे देश में प्रजातांत्रिक व्यवस्था को लागू हुए सात दशक से अधिक समय हो गया हो, पर लोकतांत्रिक मूल्यों को हम अभी तक पूरी तरह अंगीकार नहीं कर पाये हैं. तात्कालिक रूप में भावुकता में कभी-  कभी  आम जन   का इस 'जंगल के न्याय' को भी समर्थन दिखाई देने लगता है, पर इस प्रवृत्ति के दूरगामी घातक परिणाम होने की संभावना है.
वैसे ही समाज में अपराधीकरण बढ़ता जा रहा है ऐसे में ऐसी घटनाएं निश्चित रूप से हमें बर्बरता की ओर ही अग्रसर करेंगी.
             दुर्दांत अपराधी को  तुरंत सजा का निर्णय ( एनकाउंटर) और पुलिस व राज्य सरकार द्वारा अपनी पीठ थपथपाने का यह कार्य तात्कालिक रूप में समाज के एक वर्ग  द्वारा  भले ही उचित माना जा रहा हो , पर यह घोर अपरिपक्वता की ओर संकेत करता है।
             यह भी कहा जा रहा है कि कई बड़ी मछलियों (नेता व अधिकारी) के नाम सामने न आ जायें, इसीलिए यह एनकाउंटर कर दिया गया. हमारे देश में राजनीतिक नेताओं व अपराधियों का गठजोड़ नई बात नहीं रह गयी है. लोग यह मानने लगे हैं कि  राजनेता अपने हित में कुछ भी कर सकते हैं। इस तरह की बढ़ती प्रवृत्ति हमारे लोकतंत्र व संवैधानिक व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है.
              एक दुर्भाग्यपूर्ण सत्य यह भी है कि हमारी न्याय की प्रक्रिया इतनी दोषपूर्ण व असहाय हो गयी है कि पुलिस थाने में राज्यमंत्री दर्जे के व्यक्ति की हत्या कर भी विकास दुबे जैसे दुर्दांत अपराधी के विरुद्ध कोई गवाही (  पुलिस कर्मी भी) नही देता और वह छूट जाता है. पर न्याय व्यवस्था की इस खामी को दूर करने की जगह एनकाउंटर जैसे उपायों  को सामाजिक स्वीकृत देना 'जंगल के न्याय' को ही स्वीकृति देना है, जो सभ्य शासन के लिये न केवल शर्मनाक है बल्कि अभिशाप भी है.
             हमेँ विचार करना होगा कि समाज की इस विकृति को कैसे दूर करें? वाहवाही के चक्कर में 'अपराधियों को ठोक दो' की नीति हमें बर्बरता की ओर ले जायेगी और कब इसके शिकार निर्दोष नागरिक व राजनीतिक विरोधी होनें लगें, कोई नहीं जानता.
             भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में कहा गया है: 
     “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा कोई भी व्यक्ति को उसके जीवित रहने के अधिकार और निजी स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता.”
 इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति को अपने जीवन से वंचित करने से पहले, राज्य को ' आपराधिक प्रक्रिया संहिता' के प्रावधानों के अनुसार उचित न्यायिक प्रक्रिया को अपनाना जरूरी है.
            अभियुक्त को पहले उसके खिलाफ आरोपों के बारे में सूचित करना चाहिए, फिर उसे स्वयं का बचाव करने का अवसर दिया जायेगा, वह अपना वकील कर सकता है. इस प्रक्रिया के बाद यदि वह दोषी पाया जाता है, तभी उसे अदालत मृत्युदंड दे सकती है। 
              यह पाया गया है कि  ‘एनकाउंटर’ अधिकतर  सही नहीं होते.   इनमें सभी कानूनी प्रक्रियाओं को दरकिनार कर  तथाकथित  अपराधी  माार दिया जाता है। दुर्दांत अपराधियों के   विरुद्ध  कोई सबूत या गवाही नहीं  मिलती इसलिए  वे  छूट जाते हैं  और 
 आतंक फैलाते हैं अतः  उनसे निपटने का एकमात्र तरीका 'एनकाउंटर' ही है, एक खतरनाक व् असंवैधानिक सोच है और इसका घोर दुरुपयोग हो सकता है।
               सुप्रीम कोर्ट ने 'प्रकाश कदम बनाम रामप्रसाद विश्वनाथ गुप्ता (2011)'  मामले में  कहा कि पुलिस द्वारा किए गए फर्जी ‘एनकाउंटर’ सोची समझी हत्याओं के अलावा कुछ नहीं हैं और उन्हें करने वालों को ‘दुर्लभतम मामलों के दुर्लभतम’ ( rarest of rare) की श्रेणी में रख कर मौत की सजा दी जानी चाहिए। 
               जरूरत न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावी बनाने की है जिसमें लोगों को त्वरित व निष्पक्ष न्याय मिल सके. ऐसे सामाजिक व राजनीतिक पर्यावरण के निर्माण की आवश्यकता है जिसमें सत्ता (पुलिस) - अपराधी गठजोड़ का पर्दाफ़ास हो. सत्ता से जुड़े एवं अन्य राजनीतिक नेता सार्वजनिक जीवन में उच्च व  साफ - सुथरी  छवि निर्मित करें.  यद्यपि वर्तमान सामाजिक व राजनीतिक परिवेश में यह दिवास्वप्न लगता है, फिर भी आशावादी रहना ही उचित होगा.
                 

Sunday, July 19, 2020

गीतों के राजकुमार- स्व. गोपाल दास ' नीरज जी'


       हिन्दी के लोकप्रिय कवि,  सुमधुर गीतों के राजकुमार, फिल्म जगत में अपने गीतों से विशिष्ठ स्थान बनाने व धूम मचाने वाले ,कालजयी रचनाओं के सृजनकर्ता , कवि सम्मेलन के मंचो के अप्रतिम नायक श्री गोपाल दास 'नीरज' आज द्वितीय पुण्यतिथि है.

     प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कालजयी रचनाओं के कुछ अंश जो जीवन के विविध रंगो का चित्रण करते हैं और एक दिशा देते हैं.

 "कफ़न बढ़ा तो किसलिये,
                            नजर तू डबडबा गयी,
  सिंगार क्यों सहम गया,
                             बहार क्यों लजा गयी,
  न जन्म कुछ,न मृत्यु कुछ,
                             बस बात सिर्फ इतनी है,
  किसी की आँख खुल गयी,
                              किसी को नींद आ गयी."
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"फूल पर हँसकर अटक, तो शूल को रोकर झटक मत, 
ओ पथिक तुझ पर यहाँ, अधिकार सब का है  बराबर.''
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''आदमी को आदमी बनाने के लिए, 
                         जिन्दगी में प्यार की कहानी चाहिए,
 और कहने के लिए कहानी प्यार की, 
                         स्याही नहीं आँखों का  पानी चाहिए।''
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"जब  हृदय का एक आँसू, 
 नयन   सीपी में उतर  कर,
 वेदना   का   अश्रु   बनता, 
 एक   क्षण     पाषाण  भी 
 भगवान     बनता        है, 
 तब मधुरतम गान बनता है। "
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 ''जीवन जहाँ खत्म हो जाता !
  उठते-गिरते,
  जीवन-पथ पर
  चलते-चलते,
  पथिक पहुँच कर,
  इस जीवन के चौराहे पर,
  क्षणभर रुक कर,
  सूनी दृष्टि डाल सम्मुख 
  जब पीछे अपने नयन घुमाता !
  जीवन   वहाँ   ख़त्म हो जाता! "
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 ''कोई नहीं पराया, 
  मेरा तो आराध्य आदमी,
  देवालय हर द्वार है.
                मेरा दर्द नहीं है मेरा, 
                सबका हाहाकार है, 
                कोई नहीं पराया, 
                मेरा घर सारा संसार है।''
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" चल रहा हूं मैं, इसी से  चल रहीं निर्जीव राहें, 
  राह पर चलती हमारे साथ ही मंजिल हमारी."  
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       "स्वप्न झरे  फूल से, मीत   चुभे शूल से, 
        लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से, 
        और हम  खड़े-खड़े   बहार   देखते रहे.
         कारवाँ   गुज़र   गया   गुबार देखते रहे."
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      " शोखियों में घोला जाये फूलों का शबाब, 
           उसमें फिर मिलाई जाये थोड़ी सी शराब, 
              होगा   जो   नशा   तैयार,  वह   प्यार  है."
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 " एक दिन   मैंने   कहा  यूँ  दीपv से, 
   तू   धरा   पर   सूर्य   का अवतार है, 
   किसलिए  फिर स्नेह  बिन  मेरे बता, 
    तू न कुछ, बस धूल-कण निस्सार है?
               लौ रही चुप, दीप ही बोला मगर
               बात  करना तक तुझे आता नहीं, 
               सत्य है सिर पर चढ़ा जब दर्प हो
               आँख   का परदा उधर पाता नहीं.
  मूढ़ ! खिलता फूल यदि निज गंध से
  मालियों  का  नाम फिर चलता कहाँ?
  मैं  स्वयं  ही  आग  से  जलता  अगर 
  ज्योति  का गौरव  तुझे  मिलता कहाँ ?"
                        ---------------
       ''सृजन  शान्ति  के  वास्ते  है ज़रूरी, 
        कि हर द्वार  पर  रोशनी  गीत  गाये, 
        तभी  मुक्ति  का vयज्ञ यह पूर्ण होगा, 
        कि जब  प्यार तलवार से जीत जाये।''

और अंत में एक कालजयी गीत की लाइनें

      "अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाये,
                  जिसमें इंसान  को  इंसान बनाया जाये."
       
               ऐसे महान साहित्यसेवी को शत् शत् नमन. 
                            🙏🙏🙏

Friday, July 3, 2020

अलविदा सरोज खान!

          फिल्म जगत की मशहूर कोरियोग्राफर सरोज खान का हृदय गति रुक जाने से मुंबई में गत दिवस (3 जुलाई (निधन हो गया.  वे 71 साल की थीं.  उनका अंतिम संस्कार आज शुक्रवार को मुंबई स्थित मलाड के मालवाणी के कब्रिस्तान हुआ.
          अपने चार दशक से अधिक के लंबे कैरियर में सरोज खान ने 2,000 से ज्यादा फिल्मी गीतों  में  कोरियोग्राफी की..        
           उन्हें अपनी कोरियोग्राफी की उत्कृष्टता पर तीन बार 'नेशनल अवॉर्ड' प्राप्त हुआ. संजय लीला भंसाली की फिल्म देवदास के गीत  'डोला रे डोला', माधुरी दीक्षित की फिल्म तेजाब के यादगार आइटम सॉन्ग 'एक-दो-तीन' एवं 2007 में आई फिल्म 'जब वी मेट' के गीत ' ये इश्क...' के लिए  उन्हें नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया.
          सरोज खान ने अंतिम बार 2019 में  करण जौहर के प्रोडक्शन हाउस के अंतर्गत बनी फिल्म ' कलंक' में 'तबाह हो गए...' गीत को  कोरियोग्राफ किया था जिसमें माधुरी दीक्षित थीं. 
          फिल्म जगत की अनेक  हस्तियों ने आज उनके साथ बीते अपने अनुभवों को साझा किया. माधुरी दीक्षित, करीना कपूर एवं शाहरुख खान ने  अत्यंत भावुक होकर याद किया.
          बड़े ही संघर्षो में रह कर उन्होंने कोरियोग्राफी में नई ऊचाइयाँ को छुआ और नृत्य (dance) को  एक सम्मानजनक स्थान दिलाया. कोरियोग्राफी के क्षेत्र में उनके योगदान को कभी भुलाया जा सकेगा.
                🙏🙏🙏

Wednesday, July 1, 2020

आइये सही मायनों में लोकतांत्रिक बनें


      हम भारतीय 'लोकतंत्र' को अब तक सही अर्थों में आत्मसात नहीं कर सके  हैं. हम सदियों से राजतंत्रीय व्यवस्था के आदी रहे हैं और शासक में देवत्व व उसे नायक के रूप में देखने की हमारी आदत रही है. लोकतन्त्र हमारे मनोविग्यान के अनुकूल नहीं हैं. जिससे हम खुश होते हैं उसके भक्त हो जाते हैं और उसके खिलाफ़ एक शब्द भी नहीं सुनते और जब नाराज हो जाते हैं तो उसी hero को zero बनाने में देर नहीं लगती. इंदिरा गांधी,राजीव गॉधी और विश्वनाथ प्रसाद सिंह ने जनता के इन दोनों रूपो को झेला था.
      लोकतंत्र केवल चुनाव में वोट डालना ,चुनाव लड़ना व चुनाव मे जीत कर सरकार बनाना ही नहीं  है.लोकतंत्र में आलोचना पर ध्यान देकर सरकार को अपनी कमियों को दूर करने का अवसर मिलता है.सतत् जागरूकता ही लोकतंत्र की कुंजी है. इसके लिये विवेकपूर्ण जनमत का निर्माण होना अत्यन्त आवश्यक है.
      आज भारत की विश्व में जो स्वीकार्यता है वह केवल मोदी जी के तीन वर्ष के शासनकाल में नहीं बनी है.कांग्रेस के लंबे शासन का और अटल जी के कार्यकाल का भी इसम महत्वपूर्ण योगदान है.सुषमा स्वराज जी ने हाल ही में UNO में अपने भाषण में बड़ी ईमानदारी से इसे स्वीकार किया भी है.
     लोकतंत्र एक स्वयंसुधारक व्यवस्था है .UK, जिसे लोकतंत्र का घर कहा जाता है, में सरकार भी संप्रभु (crown )की कहलाती है ,और विरोधी दल ( shadow cabinet) भी crown का.
    आलोचना व विरोध सरकार को अपनी कमियों में सुधार का अवसर प्रदान करता है और कभी- कभी जनमत की इच्छा को भी अभिव्यक्त करता है जिसके सामने सरकार को नतमस्तक होना पड़ता है.प्रसिद्ध राजनीतिक विचारक गिलक्राइस्ट( Gilchrist) का कथन याद आ रहा है ,
     "प्रत्येक वैधानिक संप्रभु के पीछे एक राजनैतिक संप्रभु होता है, जिसके सम्मुख वैधानिक संप्रभु को नतमस्तक होना पड़ता है ."
     इस राजनैतिक संप्रभु में विरोधी दल, दबाव समूह, हित समूह, trade unions, व्यापारिक समूह आते हैं.
       विपक्ष तो आलोचना करता ही है. मनमोहन सिंह की सरकार के समय आधारकार्ड की अनिवार्यता, GST पर विरोध व संसद की कार्यवाही ठप्प करने का काम विरोधी दल भाजपा ने जिस प्रभावी ढंग से किया, वर्तमान विरोधी पक्ष तो उसका दशांश भी नहीं कर पाया. इन्हीं मोदी जी ने जी.  एस. टी. व आधार कार्ड का मुखर विरोध किया था जिसके वीडियो भी सोशल मीडिया पर दिखाई दिये हैं.
     सरकार में आने पर जिम्मेदारी बढ़ती है. राष्ट्रीय हित के हिसाब से नीतियॉ बनानी पड़ती है.नीतियों की आलोचना को भी सहन करना पड़ता है.
     आज आम लोग महसूस कर रहे हैं कि शासन की नीतियॉ बडे व्यापारिक घराने के हित में अधिक हैं ,छोटे व्यापारियों,व आम लोगों के हित में कम . यदि लोग कार्टून व व्यंग्य के माध्यम से अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति करते हैं,तो उसको खेल भावना से लेना चाहिये. आखिर आर. के.लक्ष्मण व बाल ठाकरे एक कार्टूनिस्ट के तौर पर ही तो लोकप्रिय रहे थे जिन्होने अपने समकालीन सभी राजनेताओं पर कार्टून बनाये थे और कोई भी बुरा नहीं मानता था.
     आज मोदी जी के ऊपर जरा सी भी व्यंग्य उनके समर्थकों को सहन नहीं हो रहा है.एक कार्यक्रम में मेरे एक वरिष्ठ ने कहा कि प्रधानमंत्री सारे देश का होता है अत: उसकी आलोचना नहीं होनी चाहिये. वे यह भूल गये कि पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को विरोधीदलों ने क्या नहीं कहा, जबकि जिन घोटालों पर कांग्रेस को बदनामी मिली वे मनमोहन सिंह के काल में ही उजागर हुये थे और उनसे संबंधित लोगों पर कार्यवाही भी शुरू हो गयी थी. जब भारत में मोदी जी का राजतिलक हो रहा था उसी के आस-पास जापान में मनमोहन सिंह को विश्व का Best Primeminister of  the  World का सम्मान दिया जा रहा था.
       मेरे  कहने का तात्पर्य यह है कि यह देश के प्रधानमंत्री का कर्तव्य है कि वह देश हित में काम करे. मोदी जी भी वही कर रहे हैं जो देश के पूर्व प्रधान मन्त्रियो ने किया. कई पूर्व प्रधान मन्त्री गठबंधन सरकार चला रहे थे जिसकी अपनी मजबूरियॉ या दबाव थे.पर जब कभी किसी प्रधानमंत्री को पूर्ण बहुमत मिला, उसकी कार्य प्रणाली अलग दिखी.  यह बात इन्दिरा जी, अटल  जी और मोदी जी की कार्य प्रणाली में  दिखाई दी. 
       मोदी जी देश के ऐसे प्रधानमंत्री बने जिन्होने विश्व के अधिकांश देशों का दौरा किया और उन्हें भारत से जोडा. भारत के व्यापारिक हितो का संवर्धन हुआ. भारत की सुरक्षा को सुदृढ़ करने व सामरिक शक्ति बढ़ाने के प्रयास जारी हैं.
      पर यहॉ मै एक बात महसूस कर रहा हूँ कि सबको ,विशेषकर अमेरिका को , साधने की कोशिश में हमने रूस जैसा मित्र खो दिया.
     1971में पाकिस्तान युद्ध के समय अमेरिकी सॉतवें बेड़े की धमकी के जबाब में पूर्व सोवियत संघ ने भारत के समर्थन में युद्ध में कूदने की धमकी देकर अमेरिका को चेतावनी दी थी और अमेरिका को चुप होना पड़ा था .क्या आज चीन के आक्रमण करने की स्थिति में इस हद तक साथ देने वाला कोई विश्वसनीय मित्र आज हमारे पास है?
      मित्रो! आज हमारे सामने आंतरिक व बाह्य  अनेक चुनौतियॉ हैं. हमारा दायित्व यही होना चाहिये कि हम अंध समर्थन व अंध विरोध से मुक्त होकर देशहित में सकारात्मक दृष्टिकोण अपना कर निष्प होकर सही बात कहे , सही बात का समर्थन करें तथा नकारात्मक व गलत बातों का विरोध करें. तभी हम विवेकशील जनमत के निर्माण में अपना योगदान दे सकते हैं. सोशल मीडिया इसके लिये एक महत्वपूर्ण माध्यम सिद्ध हो सकता है.

बहुमुखी प्रतिभा के धनी-डा. बिधान चंद राय

          आज सारे देश में  ' राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस   (National Doctors day)' मनाया जा रहा है. यह दिवस  देश के जाने-  माने चिकित्सक और पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री  भारतरत्न डॉ. बिधान चंद्र रॉय की स्मृति में मनाया जाता है।   भारत में केंद्र सरकार  ने1991 में  1  जुलाई को 'नेशनल डॉक्टर्स डे ' मनाने का निर्णय किया था. उसी समय से भारत में 1 जुलाई (उनके जन्मदिन) को 'राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस' के रूप में मनाया जाता है
        आज  डॉ॰ बिधान चंद्र राय का की जयंती एवं पुण्यतिथि दोनों है. वे एक प्रसिद्ध चिकित्सक,  स्वाधीनता सेनानी एवं समाजसेवी थे. 
         डा.  राय का जन्म  पटना (बिहार) जिले के बांकीपुर गांव में हुआ था। उनके पिता श्री प्रकाश चंद्र राय डिप्टी कलेक्टर के पद पर  थे। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की।1905 में जब बंगाल का विभाजन हो रहा था जब बिधान चंद्र रॉय कलकत्ता यूनिवर्सिटी में अध्ययन कर रहे थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े और बंगाल की राजनीति में सक्रिय हुये.। इस दौरान  वे  महात्मा गांधी जी के व्यक्तिगत  चिकित्सक रहे। वे 1922 में कलकत्ता 'मेडिकल जरनल'  के संपादक  एवं बोर्ड के सदस्य भी बने। 
         उन्होंने  आज़ादी के संघर्ष में भी सक्रिय भाग लिया. भारतीय स्वतंत्रता सेनानी तथा राष्ट्रीय कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता एवं गांधीवादी थे। उन्होंने 1926 को अपना पहला राजनीतिक भाषण दिया तथा 1928 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य चुने गए। उन्हें 'बंगाल का मसीहा' भी कहा जाता है। 
          डॉ॰ बिधान चंद्र राय ने भारत की आजादी के बाद अपना पूरा जीवन चिकित्सा सेवा को समर्पित कर दिया। वे 1948 से वे 14  वर्षों तक पश्चिम बंगाल के  मुख्यमंत्री के रूप में चौदह वर्षों तक उसी पद पर रहे। डॉ. रॉय ने बंगाल में कई संस्थानों और 5 शहरों की स्थापना की। इनमें दुर्गापुर, कल्यानी, अशोकनगर, बिधान नगर और हाबरा शामिल है।
          1933 में ‘आत्मशुद्धि’ उपवास के दौरान गांधी जी ने दवायें लेने से मना कर दिया था। डा.बिधान चंद्र राय बापू से मिले और उनसे दवायें लेने का आग्रह किया. गाँधी जी उनसे बोले," मैं तुम्हारी दवाएं क्यों लूं? क्या तुमने हमारे देश के 40 करोड़ लोगों का मुफ्त इलाज किया है?" इस पर डा. राय ने उतर दिया," नहीं बापू! मैं सभी मरीजों का मुफ्त इलाज नहीं कर सकता। मैं यहां मोहनदास करमचंद गांधी को ठीक करने नहीं आया हूं, मैं उन्हें ठीक करने आया हूं जो मेरे देश के 40 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि हैं।इस पर गांधी जी ने उनसे मजाक करते हुए कहा, तुम मुझसे थर्ड क्लास वकील की तरह बहस कर रहे हो।"
           डॉ. बिधान चंद्र रॉय देश के उन डॉक्टर्स में से एक थे जिनकी हर सलाह का पालन पंडित जवाहर लाल नेहरू भी पूरी सावधानी के साथ करते थे। इसकी चर्चा नेहरू जी ने ने 'वॉशिंगटन टाइम्स ' को 1962 में दिए एक इंटरव्यू में की थी. नेहरू जी के इलाज के लिए डॉक्टर्स का एक पैनल बनाया गया था, जिसमें रॉय शामिल थे। इंटरव्यू के बाद अखबार ने लिखा था - " डा. रॉय इतने  महत्वपूर्ण हैं कि नेहरू जी भी उनके प्रत्येक  मेडिकल निर्देश का पालन करते हैं."
           डॉ॰ बिधान चंद्र राय का 1 जुलाई 1962 को ह्रदयगति रुकने से निधन हो गया। सन् 1961 में उन्हें 'भारत रत्न' से सम्मनित किया गया। सन् 1967 में दिल्ली में उनके सम्मान में डॉ. बीसी राय स्मारक पुस्तकालय की स्थापना की भ‍ी गई। 
             ऐसे इतिहास पुरुष को विनम्र श्रद्धांजलि.
                           🙏🙏🙏
      ( from my blog 'Pearls of Thoughts' )

Sunday, June 28, 2020

भारत में आर्थिक सुधारों के पुरोधा - श्री पी. वी. नरसिंह राव

            भारत के दसवें प्रधान मंत्री एवं भारत में आर्थिक सुधारों के जनक श्री पी.वी. नरसिंह राव  की तक 99वीं  जयंती है. उनका जन्म 28 जून 1921 को आंध्र प्रदेश के करीमनगर में हुआ था. हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय, मुंबई विश्वविद्यालय एवं नागपुर विश्वविद्यालय में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की. वे एक उदभट् विद्वान एवं कई  भाषाओं के ज्ञाता थे.
श्भारतीय दर्शन एवं संस्कृति, कथा साहित्य एवं राजनीतिक टिप्पणी लिखने, भाषाएँ सीखने, तेलुगू एवं हिंदी में कविताएं लिखने एवं साहित्य में उनकी विशेष रुचि थी। 
             श्री नरसिंहराव का राजनीति का सफर बड़ा ही महत्व  पूर्ण रहा. वे आंध्र प्रदेश सरकार में 1962 से 64 तक कानून एवं सूचना मंत्री, 1964 से 67 तक कानून एवं विधि मंत्री, 1967 में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा मंत्री एवं 1968 से 1971 तक शिक्षा मंत्री रहे तथा 1971 से 73 तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे.
            1977 से 84 तक वे लोकसभा के सदस्य रहे और दिसंबर 1984 में रामटेक से आठवीं लोकसभा के लिए चुने गए।  उन्होंने  देश के विदेश मंत्री,   गृह मंत्री, रक्षा मंत्री एवं मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में कुशलतापूर्वक कार्य किया.
            विदेश मंत्री के अपने कार्यकाल में श्री राव ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के क्षेत्र में अपनी शैक्षिक पृष्ठभूमि एवं राजनीतिक तथा प्रशासनिक अनुभव का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया। उन्होंने जनवरी 1980 में नई दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन के तृतीय सम्मेलन की अध्यक्षता ,मार्च 1980 में न्यूयॉर्क में जी-77 की बैठक की भी अध्यक्षता की. फरवरी 1981 में गुट निरपेक्ष देशों के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में उनकी भूमिका अत्यंत प्रशंसनीय  थी। 
              वर्ष 1982 और 1983 भारत और इसकी विदेश नीति के लिए अति महत्त्वपूर्ण था। खाड़ी युद्ध के दौरान गुट निरपेक्ष आंदोलन का सातवाँ सम्मेलन भारत में हुआ जिसकी अध्यक्षता श्रीमती इंदिरा गांधी ने की। इसकी सफलता के मूल में श्री राव के अथक प्रयास थे. वे 'विशेष गुट निरपेक्ष मिशन' के भी नेता रहे जिसने फिलीस्तीनी मुक्ति आन्दोलन को सुलझाने के लिए नवंबर 1983 में पश्चिम एशियाई देशों का दौरा किया। विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने यू.एस .ए., यू.एस.एस.आर, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, वियतनाम, तंजानिया एवं गुयाना जैसे देशों के साथ हुए विभिन्न संयुक्त आयोगों की भारत की ओर से अध्यक्षता की
           जून, 1991 की बात है. कांग्रेस ने श्री राव के कांग्रेस अध्यक्ष रहते आम चुनाव में सबसे ज्यादा 244 सीटें जीती थीं.  श्री नरसिम्हा राव को कांग्रेस संसदीय दल के नेता चुना और उन्होंने कुशलता पूर्वक अगले पाँच वर्ष तक अल्पमतीय सरकार का नेतृत्व किया. उन्होंने दौ.मनमोहन सिंह वित्तमंत्री  बनाया जिनकी आर्थिक नीति से भारत में आर्थिक सुधारों एवं उदारीकरण का दौर शुरू हुआ.
           वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए अपने एक ट्वीट में नरसिम्हा राव को एक असाधारण विद्वान बताया और लिखा कि उन्होंने इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर देश को अपना नेतृत्व दिया."  पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू ने अपनी पुस्तक "1991- The year that changed India' में लिखा है, " श्री राव का भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अमूल्य योगदान रहा है और वे भारत रत्न के हकदार हैं."
              पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी से श्री राव के गहरे संबंध रहे. कई अवसरों पर विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने दल के संसद की कार्यवाही से बहिष्कार कर श्री राव की अल्पमतीय सरकार को बचाया था.  श्री राव ने भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर देश के  कई प्रतिनिधिमंडलों को श्री बाजपेयी के नेतृत्व में भेजा था. जब श्री बाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते परमाणु विस्फोट किया गया तो उसमें श्री राव के योगदान को भी  अटल जी ने स्वीकार किया था.
              आज भी श्री राव को सम्मान के साथ याद किया जा रहा है.  यहाँ तक कि उनकी पार्टी काग्रेस, जिसने एक समय ( निधन पर भी)  उनकी घोर उपेक्षा की थी, आज उनके योगदान की चर्चा कर रही है. अक्टूबर, 2014 में  उस समय एन. डी.  ए. की सरकार में शामिल दल तेलुगू देशम पार्टी (TDP) ने एक प्रस्ताव पारित कर सरकार से मांग की थी कि नई दिल्ली में पीवी नरसिम्हा राव का समाधि स्थल बनाया जाए. इसके बाद  राष्ट्रीय राजधानी में श्री राव के नाम पर भी एक स्मृतिस्थल बन गया है.
               श्री राव के जन्म स्थल वारंगल (तेलंगाना) और आंध्र प्रदेश में राव के प्रति काफी सम्मान और सहानुभूति है. तेलंगाना की टीआरएस सरकार ने तो स्कूली पाठ्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री की जीवनी भी शामिल की थी और  उन्हें भारत रत्न देने की मांग भी कर चुकी है.
               तेलंगाना की वर्तमान टी.आर. एस. ने श्री राव के जन्मशती वर्ष पर अनेक कार्यक्रमों की घोषणा की है.
               ऐसे बहुमुखी प्रतिभासंपन्न राजनेता को जन्मतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि.
                          🙏🙏🙏

Saturday, January 26, 2019

आइये! ' गणतंत्र' को समझें


                
         सारा देश आज 70वां ' गणतंत्र दिवस '  मना रहा है .हम 15 अगस्त को 'स्वतंत्रता दिवस' भी मनाते हैं .दोनों दिवसों  की  अलग -अलग  महत्ता है .
        ' स्वाधीनता ' विदेशी शासन के साथ लम्बे संघर्ष में हमारे अनगिनत वीरों की कुर्बानियों का परिणाम है  . 15 अगस्त को हमें विदेशी गुलामी से मुक्ति मिली. इसलिये इस दिन हम 'स्वतंत्रता दिवस' मनाते हैं ...
         जब किसी से यह पूछा जाता है कि हम गणतंत्र दिवस क्यूँ मनाते हैं ? तो प्राय: एक ही जबाब आता है कि आज के दिन हमारा संविधान लागू हुआ था ....अधिकतर कार्यक्रमों में वक्ताओं के भाषण  दोनों दिवसों पर एक जैसे होते हैं ....नेता व अधिकारी भी  इनके फर्क को बहुत कम  जानते  हैं.

        यह  सच हैं कि आज के दिन हमारा संविधान लागू हुआ था .पर इस संविधान ने हमारे देश एक 'गणतंत्र' घोषित किया था .अत:संविधान को जानने के लिये हमें ' गणतंत्र ' को जानना ज़रूरी है.

        विश्व इतिहास के अध्ययन से स्पष्ट होता है  कि अधिकतर देशों में पहले 'राजतंत्र' ही थे .समय के साथ  राजतंत्र का लोकतंत्रीकरण  सबसे पहले ब्रिटेन  में हुआ जहां सीमित राजतंत्र को अपनाया गया है .जबकि लोकतंत्र का घर ब्रिटेन को ही माना जाता है .
          'संयुक्त राज्य अमेरिका'  विश्व का  सबसे  पहला राज्य था जिसने स्वयं को 'गणतन्त्र' था .उसके बाद कई राज्यों  ने गणतंत्र घोषित किया . फ्रांस,भारत, चीन , रूस सभी गणतांत्रिक राज्य हैं.

          गणतंत्र (Republic) को परिभाषित करते हुए Encyclopedia of Britainica में बताया गया  है कि गणतंत्र वह लोकतांत्रिक प्रणाली है ज़िसकी दो प्रमुख विशेषतायें होती हैं -
          प्रथम , राज्य प्रधान जनता द्वारा निर्वाचित(  प्रत्यक्ष  या अप्रत्यक्ष ) होता है ,
          द्वितीय , राज्य प्रधान वंशानुगत नहीं  होता .

           हमारे देश में भी गणतांत्रिक संविधान अंगीकृत किया गया है इसका अर्थ है कि भारत के प्रत्येक नागरिक को यह अवसर प्राप्त है कि वह  अपनी योग्यता व क्षमता के आधार पर बिना किसी भेदभाव राज्य के सर्वोच्च पद( राज्य प्रधान) पर पहुँच सके .
           हमारे देश में विभिन्न दलित व पिछड़े वर्गों के व्यक्ति भी राष्ट्रपति के रूप में  राज्य प्रधान के सर्वोच्च पद पर पहुचे हैं जैसे - आर  के  नारायणन ( दलित S C ). ग्यानी जैल सिंह (  बढ़ई ).कलाम साहब (मछुआरा  परिवार )और वर्तमान में कोविंद जी.यह गणतंत्र में  ही संभव है .
           ब्रिटेन ,जापान,स्पेन ,आस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे राज्य लोकतांत्रिक  जरूर हैं पर इन देशों में राज्य प्रधान वंशानुगत   होता है .अत: ये राज्य सीमित राजतंत्र की श्रेणी में आते हैं.

             26 जनवरी 1950 के दिन संविधानसभा ने हमारे देश के लिये एक ऐसे गणतान्त्रिक संविधान को अंगीकृत  किया था जो संप्रभु, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष,लोकतांत्रिक  व गणतंत्र  के निर्माण का वचन देता है ज़िसमें सभी को स्वतंत्रता ,समानता व न्याय की सुरक्षा मिले .,सभी भाईचारे के साथ रहें .भारतीय संविधान की प्रस्तावना उक्त बातो को उदघोषित्   करती  है .
             इसी कारण  हम 'गणतंत्र दिवस' मनाते हैं