Monday, June 19, 2017

राष्ट्पति पद पर उम्मीदवार का चयन

   किसी  का नाम तो राष्ट्रपति पद के लिये घोषित होना ही था और हो भी गया .भाजपा में ही इस चयन पर ज़मीनी स्तर  पर  असंतोष के स्वर मुखर होते दिखाई दे रहे हैं .
    यह दुर्भाग्य है देश का कि एक ऐसा संवैधानिक पद ,जो राज्य प्रधान होने के साथ संविधान के संरक्षक का  भी है , वोट पलिटिक्स केभँवर मे फँस गया है   .दलित ,अल्पसंख्यक ,उत्तर - दक्षिण और yesman  जैसे आधारों पर इस पद पर उम्मीदवारों का चयन होता आया है .इस प्रक्रिया में कभी -कभी विद्वान व्यक्ति भी च चयनित हुए हैं जैसे - सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन ,ज़िन्होने Indian presidency को एक नया व गरिमापूर्ण आयाम दिया .कलाम साहब भी इसी श्रेणी में आते हैं .
       पर सात दशकों पुराने हमारे परिपक्व  लोकतंत्र  में इन आधारों पर राष्ट्रपति पद पर चयन नहीं होना चाहिये वरन योग्यता व देश को दिये विशिष्ट योगदान के आधार पर इस पद पर चयन हो तो देश की छवि उज्जवल होगी .आखिर राष्ट्रपति अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करता है .

Tuesday, June 13, 2017

महात्मा गांधी - चतुर बनिया अथवा एक व्यवहारिक राजनीतिक व्यक्तित्व

     आज कल भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा गान्धीजी को चतुर बनिया कहने को लेकर विरोध व समर्थन का दौर जारी है.
     जहां तक अमित शाह की महात्मा गांधी जी पर टिप्पणी की बात है ,वे एक शक्तिशाली सत्तारूढ दल के अध्यक्ष व प्रधान मंत्री के बेहद भरोसे के आदमी हैं .वे किसी को कुछ भी कह सकते हैं .तुलसीदास कह ही गये हैं  -
            समरथ को नहिं दोष गोसाई .

       गांधीजी मात्र  बनिये नहीं थे .बनिया तो अपना लाभ देखता है .वे सच्चे अर्थों में महात्मा थे .उन्होने राजनीति में नैतिकता के मानदण्ड स्थापित किये .वे समझ चुके थे कि अंग्रेज सरकार की पाशविक शक्ति का मुकाबला हिंसा से नहीं किया जा सकता .इसलिये उन्होने अहिंसात्मक प्रतिरोध की  नीति अपनाई .भारत की जनता के शांतिपूर्ण मनोविग्यान की उन्हें समझ थी. वे सफल भी हुए जबकि क्रांतिकारी आंदोलन अनेक क्रांतिकारियों की कुर्बानी देकर  भी जनता में अधिक समर्थन न पा सका और असफल हो गया .
         सुभाष चन्द्र बोस जैसे सेनानी ने गांधी जी को 'महात्मा 'कहा था .ऐसे महान व्यक्तित्व को 'चतुर बनिया' कहना उसकी महानता कम करना है .ठीक उसी तरह जैसे अपनी जननी को 'माँ ' कहना सम्मानजनक होता है 'बाप की लुगाई 'कहना अपमानजनक .जबकि दोनों का आशय एक ही है .
        वर्तमान में अंध समर्थन या अंध विरोध का एक दौर वैचारिक स्तर पर चल पड़ा है .सोशल मीडिया भी इससे अछूता नहीं है .मैं सिर्फ यह कहना चाहूँगा -
  
"मैं दिये की भांति अंधेरे से लड़ना चाहता हूँ ,
         हवा तो बेवजह मेरे खिलाफ हो जाती है ."

Friday, June 9, 2017

कालजयी कवि महात्मा कबीर ---जयंती पर शत शत नमन


        आज संत कबीर की जयंती है .साहित्य का विद्यार्थी न होते हुए भी साहित्यिक अभिरूचि के कारण हिन्दी साहित्य विशेषकर कवियों के साहित्य को पढ़ा है .मुझे कबीर के साहित्य ने सबसे अधिक प्रभावित किया है .कबीर ने यह सिद्ध किया कीए साहित्य समाज कान दर्पण ही नहीं समाज का मार्गदर्शक भी होता है .सामाजिक विग्यान  के विद्यार्थी के लिये तो कबीर का साहित्य एक महत्वपूर्ण दिशा प्रदान करता है .
       कबीर ने न केवल मानवीय मूल्यो-सत्य ,सदाचरण,परोपकार व समाजसेवा- को जन जन तक पहुचाया वरन् धार्मिक पाखण्डों व सामाजिक कुरीतियों पर भी जबरदस्त प्रहार किया .हिन्दू व मुस्लिंम दोनों संप्रदायों के पाखण्डों पर उन्होने चुटकी ली. यथा -
      "माला फेरत जुग गया ,मन कान गया न फेर ,
        कर का मनका डार दे,मनका ,मनका   फेर .:
                     ------------------------
       " मस्जिद ऊपर मुल्ला पुकारे ,
                                 क्या तेरा साहब बहरा  है ."
         
                  आज भी जबकि हिन्दू ,मुस्लिम सदभाव को बिगाडने में राजनीतिक कारणो से अनेक तत्व सक्रिय हैं ,कबीर के विचार भारत की गंगा -यमुनी संस्कृति को बचाने में मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते है .
                   मैं जब हाई स्कूल में था तब मेरे मेरे हिन्दी के अध्यापक ब्रह्मलीन श्री शालिग्राम चतुर्वेदी ने कबीर पढाते समय निम्नांकित पंक्तियाँ बतायी थीं वे मुझे आज भी याद हैं और कबीर की प्रासंगिकता को  आज भी स्पष्ट करती हैं -
     "जबकि दो महान शक्तियों में था भेदभाव ,
            एक अंश भी न था ,एक दूसरे  में चाव ,
       शस्य श्यामला धरा की,रम्यमयी  गोद में ,
              उपजा       था       एक          लाल ,
        कर्मवीर ,  धर्मवीर    था            कबीर,
               देश की दशा  के मर्म को जानता था .
         एक अविछिन्नपूर्ण  ब्रह्म   पहचानता  था ."

   धन्य है भारत की धरती ज़िसने ऐसे  महात्मा को जन्म दिया .

Monday, May 8, 2017

ऐतिहासिक माहिल सरोवर की सुन्दर छटा

       उरई नगर  ( ज़िला जालौन ,उ .प्र.  )  के मध्य में स्थित ऐतिहासिक माहिल सरोवर की प्रात: कालीन छटा अत्यंत मनोरम होती है .प्रात : 4 बजे से ही यहाँ भ्रमण करने वालों की भीड शुरू हो जाती है और 10 बजे तक लोगों का आना जाना रहता है .
        यह सरोवर राजा माहिल के समय का है जो पृथ्वीराज चौहान के समकालीन था एवं एक सफल कूटनीतिक था .तालाब के किनारे उसके किले के अवशेष नाम मात्र के बचे है .किले पर ही दयानन्द वैदिक महाविद्यालय एवं डी ए  वी इंटर कालेज स्थित हैं .उसी से सटा आर्य कन्या इंटर कालेज भी है .
        कहते हैं कि  माहिल ने  यहाँ से महोबा तक सुरंग बनवाई थीं जिसका प्रवेश द्वार आज भी डी ए वी इंटर कालेज में बचा हुआ है .वहां अब शिवलिंग की स्थापना कर दी गयी है.
        इस तालाब का सुन्दरीकरण किया गया है .तालाब के चारों ओर सड़क बनी है ज़िसके दोनों ओर विविध प्रकार के पेड लगे हैं . बीच- बीच में सड़क के किनारे छतरियां व उनके नीचे बेंच बनायीं गयी  हैं .तालाब के मध्य एक उद्यान है जिसे एक पुल से जोडा गया है .पुल पर खडे होकर सरोवर को निहारना मनोरम लगता है ज़िसमे बत्तखे व मछलियां क्रीडा करती रहतीं हैं .पेडों पर बन्दरों का समूह भी प्राय:दृष्टिगोचर होता है .तालाब के किनारे अनेक मन्दिर व घाट हैं जहां से पूजा व भजनों के स्वर रोज ही सुनाई देते हैं .
         प्रात: यहाँ  विविध गतिविधियाँ  होती दिखाई देती हैं -कहीं योग व प्राणायाम करते हुए स्त्री व पुरूष , कहीं भजन गाते बुजुर्ग ,जौगिंग करते युवा  ,घूमते हुए और विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर बहस करती टोलियां ,धैर्यवान श्रोताओं को तलासते बुजुर्ग समाजसेवी व राजनेता , घूमने के बाद जल्दी घर जाने की बात करती घंटों गपशप  करती बेंच पर बैठी महिलायें ,करेले व नीम का जूस व अंकुरित चने बेचते स्टाल पर भीड .
       इस  सरोवर का पर्यावरण उन लोगों के लिये ,जो अकेले रह गये हैं या ज़िनके बच्चे बाहर हैं ,समय व्यतीत करने व स्वस्थ रहने का आधार देता है  एवं जीवनी शक्ति  प्रदान करता है .
        पर्यावरण के प्रति जागरूक कुछ युवा भी मुझे दिखे .इनमें से एक गणेश शंकर  त्रिपाठी ने कुछ पेड  लगाये हैं  और वे अक्सर बडी सी पोलीथींन में पानी भर कर पोधों को सीचते हुए दिखाई देते हैं .
        यह सरोवर किशोर प्रेमियों में भी लोकप्रिय है .अक्सर कोचिंग जाने वाले अथवा कालेज जाने वाले लडके व लडकियां  पेडों के झुरमुट के नीचे बैठे हुए बतियाते या mobile पर  chat   करते मिल जाते हैं पर अब anti-romeo squad  के चलते इनकी संख्या में कुछ कमी आयी है .
           इस पार्क की देख- रेख रंगीला चौकीदार करता हैं जो हरफनमौला व्यक्ति हैं .
           अक्सर पुष्पों का आवश्यकता से अधिक संग्रह करती महिलायें व पुरूष मिल जाते हैं  ज़िन्हे देख कर कबीर की पंक्तियाँ याद आ जाती हैं -
    "माली आवत देख कर,कलियन करी पुकार ,
      फूले फूले चुनाव लिये ,काल्हि हमारी बार ."
           मैं भी नियमित रूप से भ्रमण के लिये जाता हूँ .मुझे तो इस सरोवर का माहौल स्वर्ग( यदि है) से भी सुन्दर लगता है .

Saturday, May 6, 2017

राष्ट्र  हित में कठोर  निर्णय लेने की ज़रूरत

            आज सारा देश आतंक के साये में है .कश्मीर नासूर बनता जा रहा है .आये दिन हमारे जवान शहीद हो रहे हैं .देश के अन्दरूनी  हिस्सों  में अशांति फैलाने की कोशिशें चरम पर हैं नक्सलवाद पर लगाम नहीं लग पा रही है  
           नक्सलवाद व आतंकवाद  के समाधान पर विचार करने से पहले हमें कुछ पीछे जा कर कुछ तथ्यों पर खुले  मस्तिष्क से विचार करना पडेगा .      1974 में बंगाल के मुख्यमंत्री श्री सिद्धार्थ शंकर रे ने नक्सलवाद का दमन किया था। उसमें गेंहू तो जम कर पिसे, पर थोड़े घुन भी पीस गए।परिणामस्वरूप  कांग्रेस बंगाल में अलोकप्रिय हो गयी और आज तक वहां सत्ता में वापस नहीं आई।     
      इसी प्रकार  जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था।तब तत्कालीन प्रधान मंत्री  राजीव गांधी ने अपने सलाहकारों से उसका समाधान पूछा।किसी ने कहा, " सर, समाधान आसान है, पर आपको पंजाब में सरकार को sacrifice  करना होगा।          राजीव गांधी तैयार हो गए। के .पी .एस .गिल  को पूरा समर्थन दिया सरकार ने, और कुछ ही समय में आतंकवाद समाप्त हो गया।पंजाब में कांग्रेस की सरकार भी समाप्त हो गयी।           
          लोकतंत्र में कठोर कदम सरकारों को अलोकप्रिय बनाते हैं, जिसके डर से सरकारें कठोर कदम उठाने से डरती है.सरकार सर्जिकल स्ट्राइक इसलिए कर पाई क्योंकि पाकिस्तानियों से वोट नहीं लेना था।          
       BJP खुद कितने उतार चढ़ाव के बाद सत्ता में आई है, स्वाभाविक है कि जाना नहीं चाहती।BJP कश्मीर और छत्तीसगढ़ में सत्ता का मोह त्यागे।सत्ता का लालच इतिहास में मुँह दिखाने लायक नहीँ छोड़ता।कंधार हाइजैक आज तक BJP को शर्मिंदा करता है। 
             इतिहास मानसिंह को नहीँ जनता, ज़िसने सत्ता के  लालच में मुगलों के तलवे चाटे, इतिहास राणा प्रताप को जानता है, जिसने सत्ता को लात मारी और स्वाभिमान के लिए, सभी कुर्बानियां दीं।इतिहास में राणा प्रताप ही अमर हुए।      
  प्रधान मंत्री मोदी जी के पास मौका है।देखते हैं वो क्या चुनते हैं? सत्ता या देश का हित ? सरकार को सेना और अर्धसैनिक बलों को पूर्ण अधिकार देकर इस बीमारी को समूल नष्ट करने का निर्णय लेना चाहिये .         देश  में मानवाधिकार संगठन के नाम पर चल रही दुकानों पर ताला लगाना भी जरूरी है। यहाँ  पल रहे बौद्धिक आतंकवादियों की पहचान हो और न्याय की प्रक्रिया से गुज़ार कर वहीँ पहुचाया जाए, जहाँ प्रोफेसर साईबाबा जैसे लोग हैं।दशकों से यहाँ जो राज्य के खिलाफ बंदूक को उठाने और चलाने का वैचारिक प्रशिक्षण दे रहे हैं, उन्हें भी उनके अंजाम तक पहुँचाया जाए।       
     असली लड़ाई कश्मीर या छत्तीसगढ़ में नहीँ सरकार को दिल्ली में लड़नी है।ये बेहद शातिराना ढंग से कश्मीरी अलगाववादियों, नक्सलवादियों आदि का समर्थन करते हैं तथा सेना और अर्धसैनिक बलों को हाथ बांध कर मरने के लिए बाध्य करते हैं।         हाल में ही एक पत्थरबाज़ को जीप में बांधने की घटना पर इनका छाती पीटना आपको याद होगा। ये प्रोफेसनल रुदाली हैं।इन्हें रोने के पैसे मिलते हैं, पाकिस्तान, अरब और चीन जैसे देशों से . आपने देखा होगा, CRPF के जवान की पिटाई की अभी चर्चा होती, इससे पहले ही इन्होंने जीप में बंधे पत्थरबाज की घटना को इतना उछाला कि सरकार बैकफुट पर आ गयी।ये इनकी रणनीति है।सरकार इन्हें पहचाने, एक्सपोज़ करे। इनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित  प्रतिबंध लगाए। संविधान देश को तोडने के लिये अभिव्यक्ति की आजादी की अनुमति नहीं देता है.           
       राष्ट्रभक्ति को प्रत्येक स्तर पर पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाइये।जय हिंद केवल पुलिस और सेना ही क्यों बोले, हम क्यों नहीँ?इस संस्कृति को प्रोत्साहन  दीजिये।        
       ये असाधारण स्थिति है और इसमें सरकार असाधारण निर्णय लेना चाहिये ,यही जनता की सरकार से अपेक्षा है।कार्यवाई ऐसी कठोर  होनी चाहिये  कि  मांग  कितनी भी जायज हो पर हथियार नहीँ उठाने की हिम्मत न पडे ।ये "भटके हुए लोग" नहीं  शातिर देशद्रोही हैं, जिन्हें देश के शत्रुओं से हर तरह का समर्थन मिलता है।इनसे निबटने के लिये इस्राइल, रूस, श्रीलंका से सीख लेनी चाहिये .        
       आखिर  देश  की सुरक्षा व हित सभी चीजों से ऊपर  है इसे स्वीकार करने में किसी सच्चे देशवासी को दिक्कत नहीं होनी चाहिये .  
              मुझे इस समय अपने अग्रज स्व .आदर्श ' प्रहरी ' जी की कुछ पंक्तियां य़ाफ आ रहीं हैं - 
"  समझौते तो हों ,पर इतना य़ाद हो ,                       राष्ट्र प्रथम हो ,जो हो इसके बाद हो ,                   रखें सभी के प्रति हम सदभावना ,                      ऐसा न हो ,बाद में पश्चाताप   हो ." :

Wednesday, April 19, 2017

शत शत नमन  सुकवि 'प्रहरी ' जी को

शत शत नमन  सुकवि 'प्रहरी ' जी को
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   आज 19 अप्रेल जनपद जालौन के सशक्त कवि एवं गीतकार ,मुक्तक सम्राट के रूप में जाने वाले  स्व. आदर्श 'प्रहरी' की जन्म तिथि है .मुझे उनका अनुज होने का सौभाग्य प्राप्त है .
    उनके ' गीत संग्रह' 'प्यास लगी तो दर्द पिया है ' कीएक रचना प्रस्तुत है जो देश की वर्तमान स्थिति में भी सामयिक है -
              परिवर्तन का राग चाहिये
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शीतलता  अब नहीं ,गंग-यमुना के ज़ल में झाग चाहिये .
                                      परिवर्तन  का राग चाहिये .
        दुर्बलता  का भार सहन अब हो न सकेगा ,
        पाकर ह्रदय विशाल ,कि कोई रो न सकेगा ,
        शान्ति न अब, कायरता की पर्याय  बनेगी ,
        बहुत दिनों सोया भारत ,अब सो न सकेगा .
              अपनी ही    असावधानी से सन 62 में ,
              खोये थे जो क्षेत्र  वही भू -भाग  चाहिये .
                                 परिवर्तन का राग चाहिये .
       
        कवि  श्रंगारमयी कवितायें ,गा  न     सकेगा ,
        वीर -भाव बन ओज ,लौट कर जा न सकेगा ,
        बलिदानों की वेला  है, शत शीश आज नत  ,
        कोई भी व्यवधान , प्रगति को  ढा  न सकेगा .
               प्रियतम रण में भेज  स्वयं त्योहार मनायें ,
               आज वीर बाला का अमिट  सुहाग चाहिये .
                                  परिवर्तन   का राग चाहिये .

        देशवासियों को जब तक घर सुलभ  न होंगे ,
        ढकने  को तन ,कपड़े जब तक  दुर्लभ  होंगे ,
        आज स्वार्थ  की उसी दीप्ति को बुझना होगा ,
        उसी शिखा पर अर्पित ,अब नर-शलभ न होंगे .
                 आज प्रण करो संकल्पी आवाज लगा कर,
                  कुछ पाने से पहले   करना   त्याग चाहिये .
                                    परिवर्तन का   राग   चाहिये .

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Monday, March 13, 2017

होली -मेरे लिये कभी न भूलने वाला पर्व

होली - मेरे लिये कभी न भूलने वाला पर्व
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      होली का पर्व  वैसे तो  सभी पर्वों में में सबसे अधिक 'उल्लास एवं मस्ती से मनाया जाने वाला त्योहार है पर उरई में हमारे कुटुम्ब की लगभग 125 वर्ष पुरानी परम्परा इसे हम सबके लिये विशेष बना देती है .मेरा आवास  उरई( ज़िला -जालौन ,उत्तर प्रदेश ) के राम नगर   मोहल्ले  में है .यहां मेरे कुटुम्ब( सक्सेंना परिवार ) के 15 परिवार रहते हैं .
     होलिका दहन के अगले दिन सभी परिवारों के पुरूष और बच्चे एक स्थान पर एकत्र होते हैं और फिर लगभग 40-50 लोगों का समूह  कुटुम्ब के प्रत्येक परिवार में जाता है जहां  सभी रंग भरी  होली खेलते हैं .देवर अपनी भाभियों को रंगों से रंग देते है .कोई भी बिना रंगे नहीं जाता .प्रत्येक परिवार का मुखिया अबीर ,गुलाल एवं पकवानों से सभी का स्वागत करता है .हर परिवार अपनी एक विशेष dish  के लिये जाना जाता है ज़िसका लोगों को  साल भर इंतजार रहता है.
      समय के साथ सामाजिक प्रतिमान भी बदल रहे हैं पर खुशी इस बात की है कि इस परम्परा के निर्वाह में नई पीढी भी पूरी दिलचस्पी रखती है . जो परिवार अकेले पति -पत्नी रह गये हैं ,या ज़िनके बच्चे अवकाश न मिलने ,दूरी या व्यस्तता के कारण नहीं आ पाते हैं ,उन्हें भी इस परम्परा के रहते अकेलापन  कम महसूस होता है .
       पिछले पचास वर्षों में हमारे कुटुम्ब के एक सदस्य श्री सुशील प्रकाश सक्सेंना ,ज़िनकी उपस्थिति से इस परम्परा में बडी जीवन्तता रहती थीं ,इस नश्वर संसार को छोड गये उनकी  कमी इस बार बहुत महसूस हुयी .परिवार की एक बहू  शालिनी के निधन से भी माहौल गमगीन रहा .